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आप नहीं जानते होंगे भीमराव अंबेडकर की जिंदगी के ये सच, इस शहर में दिए थे धर्म परिर्वतन के संकेत

Sat, 17 Mar 2018 02:44 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा Updated Sat, 17 Mar 2018 02:44 PM IST
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before sixty year ago bhim rao ambedkar come in agra
आगरा में बाबा साहब - फोटो : अमर उजाला
संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जिस दिन आगरा आए, अंबेडकर अनुयायियों के लिए वह दिन उत्सव बन गया। 62 साल पहले 18 मार्च 1956 को डॉ. अंबेडकर रामलीला मैदान में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के 15वें अधिवेशन में हिस्सा लेने आगरा आए थे। इसी मैदान पर उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का संकेत दे दिया था। 
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गौतम बुद्ध की इस प्रतिमा को किया था स्थापित - फोटो : अमर उजाला
आगरा में चक्कीपाट के पूर्वोदय बुद्ध विहार की उन्होंने स्थापना की और अपने हाथों से भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमा रखी। रविवार को 62 साल बाद उनके पौत्र प्रकाश राव अंबेडकर इतिहास दोहराने उसी मैदान पर आ रहे हैं। डॉ. अंबेडकर 1946 और 1956 में दो बार आगरा आए। सबसे पहले वह 1946 में सुभाष पार्क में आए, जब उन्होंने आगरा के जूते और लेदर प्रोडक्ट को रेलवे की प्राथमिकता में शुमार कराया। 
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डॉ. भीमराव अंबेडकर - फोटो : अमर उजाला
दूसरी और अंतिम बार वह 18 मार्च 1956 को शहर आए। रामलीला मैदान पर उन्होंने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के अधिवेशन में भारी मन से कहा था कि मुझे पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दे दिया। पढे़ लिखे लोग मेरे काम में हाथ बटाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित राष्ट्रीय बौद्ध महासभा द्वारा उनके आगरा आगमन के 62 साल पूरे होने पर उसी रामलीला मैदान में बुद्ध धम्म दीक्षा समारोह आयोजित किया जा रहा है। 
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आगरा में बोलते बाबा साहब - फोटो : अमर उजाला
इसमें डॉ. अंबेडकर के पौत्र प्रकाशराव अंबेडकर आएंगे। चक्कीपाट बौद्ध विहार में डॉ. अंबेडकर की अस्थियां भी रखी हैं, जिन्हें उनके पुत्र यशवंतराव अंबेडकर 1957 में लेकर आए थे। उनकी यादों को आगरा के अधिवक्ता और दलित चिंतक करतार सिंह भारतीय ने किताब के रूप में संजोया है। 18 मार्च 1956 को रामलीला मैदान में ही डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के संकेत दे दिए थे। 
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बाबा साहब - फोटो : अमर उजाला
बौद्ध धर्म स्वीकार करने से सात महीने पहले उन्होंने उसी दिन चक्की पाट में पूर्वोदय बुद्ध विहार में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की। उसी दिन से चक्कीपाट का नाम बुद्ध विहार पड़ गया। साल में केवल एक दिन 6 दिसंबर को बाबा साहब का अस्थि कलश लोगों के दर्शनार्थ रखा जाता है। 
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