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अपराजिता: खुद अपना उद्योग खड़ा किया, औरों को भी दिया रोजगार, पढ़ें इन महिलाओं की सफलता की कहानी

Sat, 08 Aug 2020 12:47 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Sat, 08 Aug 2020 12:47 AM IST
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Aparajita 100 Million Smiles succes story of women entrepreneurs
आगरा की महिला उद्यमी - फोटो : अमर उजाला

अमर उजाला के अभियान अपराजिता के तहत हम ताजनगरी की उन महिलाओं के संघर्ष की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने न केवल कामयाबी का मुकाम पाया बल्कि वो औरों के लिए नजीर भी बनी हैं। इन महिलाओं ने उद्योग-धंधे चलाने में महारथ दिखाई है। ये  'अपराजिता' महिलाएं विपरीत हालात में होते हुए भी उद्योग लगाकर न केवल खुद अपने पैरों पर खड़ी हुईं बल्कि औरों को भी रोजगार दे रही हैं। इन महिलाओं का कहना है कि हम पहले मजबूर थे, लेकिन अपनी शक्ति को पहचाना तो मजबूत हो गए। जिंदगी में उतार-चढ़ाव आए लेकिन हम एक-एक कदम बढ़ाते चली गईं। अगली स्लाइड्स में पढ़िए इन अपराजिता महिलाओं की कहानी....

Aparajita 100 Million Smiles succes story of women entrepreneurs
शू एक्सपोर्टर मानसी चंद्रा - फोटो : अमर उजाला
नाम- मानसी चंद्रा। पेशा- शू एक्सपोर्टर

2011 में जूता फैक्टरी लगाई, आज 100 करोड़ का टर्नओवर

वर्ष 2011 की बात है। जब मेरे पति का देहांत हो गया। उनके जाने के बाद दो और 10 साल की बेटी की जिम्मेदारी आ गई। हिम्मत कुछ टूटी, लेकिन हार नहीं मानी। वर्ष 2013 में किराए की जगह पर शू निर्यात फैक्ट्री शुरू की। खरीदार अच्छा मिल गया तो काम भी चल निकला। तीन साल बाद खुद की जमीन भी खरीद ली। आज रोज करीब 4500 जोड़ियां बनती हैं। कंपनी का टर्नओवर 100 करोड़ का हो चुका है।
Aparajita 100 Million Smiles succes story of women entrepreneurs
शू एक्सपोर्टर मानसी चंद्रा - फोटो : अमर उजाला
लोगों को सोच बदलने की जरूरत: मानसी चंद्रा

शू एक्सपोर्टर मानसी चंद्रा कहती हैं कि समाज में आज भी महिला को कमजोर माना जाता है। इसी सोच के कारण महिलाओं को आगे बढ़ने में परेशानी आती है। उनके साथ भी यही हुआ। वह जूता निर्यात में आईं तो किसी को यकीन नहीं था कि वह सफल हो पाएंगी। लोग सलाह देते थे, कुछ और काम देख लो, यह तुम्हारे बस का नहीं है। पूंजी जुटाना, कुशल कारीगर ढूंढना बहुत मुश्किल काम था, लेकिन मैंने किया और सफलता पाई।

चुनौतियां
1. महिलाओं को उद्योग लगाने और चलाने का अलग से कोई प्रशिक्षण नहीं।
2. महिलाओं को उद्योग लगाने के लिए पूंजी देने की योजनाएं हैं लेकिन प्रक्रिया जटिल है।
3. लोगों की सोच बदलना जरूरी है, महिला को आगे बढ़ने से रोकते हैं।
 
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इंटीरियर डिजाइनर सुरभि परमार - फोटो : अमर उजाला

नाम सुरभि परमार, पेशा-  इंटीनियर डिजाइनर 

पति के साथ शुरू की इंटीरियर फर्म और बैग्स-कैप्स का ऑनलाइन कारोबार


घर को करीने से सजाने का शौक बचपन से ही लग गया था। इसे कारोबार के तौर पर खड़ा करने से पहले काफी संघर्ष करना पड़ा। दो साल दिल्ली में नौकरी की और पेशे से संबंधति कोर्स भी किया। इसके बाद आगरा का रुख किया। यहां दो साल जॉब कर शागिर्दी ली। लोगों ने काफी बोला कि छोटा शहर है, यहां कुछ नहीं हो सकता है। मगर, अपना ही काम शुरू करने की धुन सवार थी। आज पति के साथ सफल फर्म खड़ी कर ली है। बैग्स, कैप्स का ऑनलाइन काम भी है। 

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इंटीरियर डिजाइनर सुरभि परमार - फोटो : अमर उजाला
सिर्फ बातें करने के लिए मांगते थे मेरा नंबर: सुरभि
 

इंटीरियर डिजाइनर सुरभि परमार ने बताया कि साइट पर जाना पड़ता है। इस दौरान कई लोग ऐसे भी टकराते हैं, जो बस फोन नंबर लेने की फिराक में रहते हैं। अगर नंबर मिल जाता तो काम की बात करने की बजाय इधर-उधर की बात करने लग जाते हैं। इससे बड़ी टीस होती थी। साइट पर अगर देर हो जाती है तो डर लगता है कि रास्ते में कुछ हो जाए। परिवार के सदस्यों को भी चिंता रहती है।

 

चुनौतियां

1. देर रात तक काम सकें, महिलाओं को ऐसा माहौल नहीं मिल रहा।

2. इंटीरियर डिजाइनिंग के लिए युवतियों को सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण नहीं है।
3. लोगों की सोच बदलने की जरूरत, महिलाओं का हुनर देखें, चेहरा नहीं।

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