मैनपुरी में तहसील किशनी की ग्रामसभा समान के गांव भागनगर का अस्तित्व समाप्त हो गया है। यहां रहने वालों की जमीन समान पक्षी विहार में चली गई है। उनकी गांव के नाम से पहचान खत्म हो गई। परिवार भी तितर-बितर हो गए। 32 साल बाद भी पीड़ितों को मुआवजा और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया है।
ग्रामसभा समान में शामिल 36 गांवों में से एक था भागनगर। यह राजस्व अभिलेखों में दर्ज और यहां 20 परिवार रहते थे। इनके पास लगभग 800 बीघा जमीन थी। वर्ष 1990 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत समान पक्षी विहार को विकसित करने के लिए गांव भागनगर की समस्त जमीन सरकार ने अधिग्रहीत कर ली। अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों को सर्किल रेट के आधार पर जमीन का मुआवजा देने की बात कही गई। इधर समान पक्षी विहार विकसित हुआ तो गांव में पानी भरने लगा। रोजी-रोटी का साधन समाप्त होने तथा घरों में पानी भरने से एक-एक करके सभी परिवार गांव छोड़कर चले गए। यह लोग अलग-अलग राज्य व शहरों में रहकर मेहनत मजदूरी कर घर का खर्चा चला रहे हैं। गांव में मकान जमींदोज हो चुके हैं। पहचान के नाम पर मात्र एक टीला बचा है।
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अधिग्रहीत जमीन
- फोटो : अमर उजाला
नहीं मिले आवास
जनवरी 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समान पक्षी विहार आए थे। भागनगर के लोगों की मांग पर उन्होंने क्रिस्टल योजना के तहत मकान बनवाकर दिलाने के निर्देश तत्कालीन डीएम को दिए थे। समान के बाहर कॉलोनी तो बनाई लेकिन आवास दूसरे लोगों को आवंटित कर दिए गए।
आस में छूटी सांस
मुआवजे की आस में कई लोगों की सांस छूट चुकी है। जमीनों के मालिक रहे रामनरेश, कायम सिंह, छोटेलाल, राजाराम, रामनाथ, राजकुमार, जंगीसिंह, दुर्गविजय सिंह, पुत्तूलाल, रामचंद्र, जगन्नाथ की मौत हो चुकी है।
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पीड़ित परिवार
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पति की मौत, तीन बेटियों का पालन
50 बीघा के मालिक रामनरेश यादव की मुआवजा मिलने की आस में मृत्यु हो चुकी है। उनका परिवार भी समान में रहता है। पत्नी पुष्पा मजदूरी कर पुत्री दीक्षा, अर्चना, नीरू, पुत्र रेवतीरमण को पाल रही हैं। परिवार के लोग भी खर्च चलाते हैं। पुष्पा का कहना है जमीन और पहचान तो चली गई। कम से कम मुआवजा तो मिलना चाहिए।
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दिव्यांग भी परेशान
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दिव्यांग मुआवजे को लगा रहा चक्कर
भागनगर के ओमप्रकाश यादव की 40 बीघा जमीन अधिग्रहीत हुई है। उनका दिव्यांग पुत्र प्रदीप कुमार मुआवजा पाने की आस में दिव्यांगता के बाद भी अधिकारियों के चक्कर लगाता है। उसका कहना है कि भागनगर की पहचान खत्म हो गई है। जमीन बची नहीं है। मुआवजा मिल जाए तो परिवार की परेशानी काफी हद तक दूर हो जाएगी।