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नलवाड़ी मेले ने तय किया 130 साल से ज्यादा सफर, रोचक है कहानी

Mon, 18 Mar 2019 02:01 PM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Mon, 18 Mar 2019 02:01 PM IST
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State Level Nalwari Fare Story Bilaspur Himachal Pradesh

करीब 130 वर्ष पूरे कर चुके नलवाड़ी मेले का स्वरूप अब बदल गया है। गोबिंद सागर झील में डूबे सांडू के मैदान में आयोजित होने वाले मेले ने नए शहर बिलासपुर के लुहणू मैदान तक का लंबा सफर तय किया है। नलवाड़ी का आकर्षण आम जनता के लिए तब भी था और आज भी है। 60 के दशक में नलवाड़ी मेला सांडू मैदान में राजा के आदेशों के मुताबिक चलता था। उस समय भी यहां पर व्यापारी सामान लेकर पहुंचते थे।

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तब ऊंटों में सामान लेकर व्यापारी पंजाब के रोपड़ व नवांशहर से यहां पहुंचते थे। रोपड़, नालागढ़ और बिलासपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से बैलों की मंडी नलवाड़ी मेले में लगती थी। हजारों की संख्या में पशुओं का क्रय-विक्रय होता था। बताया तो यह भी जाता है कि पुराने शहर से हर परिवार की महिलाएं बैलों को आटे के पेड़े खिलाती थी। इसे पुण्य माना जाता था। हालांकि उस समय बिजली की व्यवस्था नहीं होती थी, लेकिन तब भी काफी चकाचौंध रहती थी।

State Level Nalwari Fare Story Bilaspur Himachal Pradesh

लेकिन समय के साथ नलवाड़ी मेला बिलासपुर के नए लुहणू मैदान में शिफ्ट हो गया। यहां पर मेला और रंग रंगीला हो गया। पहले इस मेले का आयोजन नगर पालिका करती थी लेकिन बाद में इसे राज्य स्तरीय मेला घोषित कर दिया गया, जिसके बाद जिला प्रशासन व सरकार ने इसे चलाना शुरू कर दिया। पहले भी नलवाड़ी मेले में छिंज मुख्य आकर्षण थी। करीब 47 वर्षों से इस मेले को लुहणू मैदान में आयोजित किया जाता है।

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नलवाड़ी मेले में पहले भी रात्रि कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। जिसमें प्रसिद्ध लोक कलाकार लोक संस्कृति से ओतप्रोत कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। उस समय स्व. गंभरी देवी, रोशनी देवी व संतराम चब्बा आदि प्रसिद्ध लोक कलाकार हुआ करते थे। जिन्हें सुनने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग पहुंचते थे। 

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किसी समय उत्तर भारत के प्रसिद्ध मेलों में बिलासपुर का नलवाड़ मेला अब अपना वास्तविक स्वरूप खो चुका है। कभी लाखों के पशुधन का इस मेले में कारोबार होता था। अब यहां बैल पूजन के लिए भी बैल मंगवाने पड़ते हैं। हालांकि मेलों में लोग नाममात्र की गाय, भैंस और कुछ बैल लेकर पहुंचते हैं। वह भी कारोबार को न होकर यहां आयोजित होने वाली पशु प्रतियोगिताओं में भाग लेने पहुंचते हैं। जिस कारण अब यह मेला रस्मों को अदा करने तक ही रह गया है। हालांकि सरकारी अमले का मेले को सफल बनाने का काफी प्रयास रहता है।

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