वीरभद्र और सुखराम के बीच मंडी की सियासत में आखिर क्या पक रहा है। लोग इसकी पहेली बुझा रहे हैं। हिमाचल की राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे वीरभद्र सिंह का पंडित सुखराम के स्वागत में दिया गया बयान चर्चा का विषय बना हुआ है।
इसके पीछे भी हिमाचल की राजनीति के दोनों दिग्गजों की अंदरूनी सियासत मानी जा रही है। मंडी से कांग्रेस का टिकट क्लीयर होने के बाद ही लोगों को वीरभद्र और सुखराम के ये सियासी दांव समझ में आ पाएंगे। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह ने प्रतिक्रिया दी है कि कांग्रेस हाईकमान का फैसला उन्हें स्वीकार है। कांग्रेस मंडी सीट को जीतेगी। उनके इस बयान से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
वीरभद्र सिंह ने कहा है कि अनुशासित पार्टी सदस्य होने के नाते हम सब हाईकमान के इस फैसले को स्वीकार करते हैं। उनके आने से कुछ अच्छा असर तो होगा ही, हम साथ मिलकर कांग्रेस को मजबूत करेंगे। हमारी कोशिश होगी कि मंडी सीट पर कांग्रेस विजयी हो। डेढ़ साल पहले वीरभद्र सिंह ने सुखराम के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने पर उन्हें ‘आया राम, गया राम’ की संज्ञा दी थी।
पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री पंडित सुखराम ने छह दशकों के सियासी करियर में ऐन मौके पर चौथी बार पाला बदला है। उन्होंने पहली बार 1998 में कांग्रेस से अलग होकर हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी का गठन किया था। सुखराम की हिविकां ने धूमल को समर्थन देकर वीरभद्र के नेतृत्व वाली कांग्रेस को महज एक सीट के अंतर से सरकार बनाने से रोक दिया।
पंडित सुखराम ने इसके बाद वर्ष 2003 में परिवार समेत कांग्रेस में वापसी कर ली। उनके बेटे अनिल शर्मा ने सदर से चुनाव लड़ा और सरकार में मंत्री बने। इसके बाद सुखराम परिवार वर्ष 2017 तक कांग्रेस में रहा।