कहते हैं हौंसले बुलंद हों तो मंजिलें अपने आप मिल जाती हैं। बस चालक की बेटी की एक जिद्द ने उसकी जिंदगी बदल दी। जिला स्तर पर सोना जीतने वाली हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की कुसुम ठाकुर ने एक फिर बिना कोच और सुविधाओं के पथरीले रास्तों पर प्रेक्टिस कर मैदान मार लिया है। चोटिल होने के बावजूद 100 मीटर की रेस में सभी धावकों को पछाड़ते हुए प्रथम स्थान हासिल किया है। कुछ ही देर बाद वह मैदान में 400 मीटर की रेस के लिए उतर गई। इस रेस में कुसुम ने तीसरा स्थान हासिल किया। मौका था नेशनल युवा कोआपरेटिव सोसायटी (एनवाईसीएस) के तत्वावधान में पड्डल मैदान में जर्नी फॉर ग्लोरी दौड़ प्रतियोगिता का।
कुसुम के पिता डोलू राम कहते हैं कि 11 वर्ष की उम्र में ही कुसुम ने दौड़ मुकाबलों में भाग लेना शुरू किया था। पहली बार जिलास्तरीय प्रतियोगिता में वर्ष 2012 में जब वह मंडी पहुंची तो विभागीय अधिकारियों ने उन्हें रेस में भाग लेने के लिए अयोग्य करार दिया था। कारण था कि अंडर-15 रेस में 12 से 15 वर्ष के धावक ही भाग ले सकते थे। इस समय कुसुम महज 11 वर्ष की थी। लेकिन, कुसुम की जिद को देखकर विभागीय अधिकारियों ने उसके पिता से अंडरटेकिंग लेकर उसको दौड़ा दिया।
तीन हजार मीटर की इस रेस में एक दर्जन के लगभग प्रतिभागियों को पछाड़ कर कुसुम ने चौथा स्थान हासिल किया। बेशक वह रेस को हार गई। लेकिन, जिंदगी व धावक बनने की कुसुम की रेस यहीं से शुरू हुई। इसके बाद लगातार तीन बार जिलास्तरीय प्रतियोगिताओं में कुसुम ने पदक हासिल किया। हर साल पदक का रंग बदलता गया। कांस्य से रजत व रजत से सोना। इस वर्ष की रेस में गोल्ड मेडल हासिल कर वह अब राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेगी।
राकेश ठाकुर ने दिए दस हजार रुपये- कुसुम ने चोटिल होने के बावजूद भी बुधवार को ऐतिहासिक पड्डल मैदान एक बार फिर मार लिया। कुसुम का कहना है कि कम उम्र में जब रेस को हार गई, तभी से घर जाकर प्रतियोगिता को जीतने का प्रण लिया था। यहीं से धावक बनने का जनून सवार हुआ था। बेटी के जुनून को लोगों का साथ मिलने लगा है। मंडी शहर के कंप्यूटर संचालक राकेश ठाकुर ने कुसुम के परिवार को दस हजार रुपये की आर्थिक मदद दी है। इसी मदद से कुसुम के पिता डोलू राम ने बेटी के लिए किट और जूते खरीदे।
पिता निजी स्कूल की चलाते हैं बस- बैला पंचायत के पिपलागलु गांव की कुसुम ठाकुर (14) राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला स्यांज में नौवीं की छात्रा है। कुसुम के पिता डोलू राम निजी स्कूल की बस चलाते हैं। बुधवार को कुसुम के साथ आने वाला कोई नहीं था। इस कारण डोलू राम को ड्यूटी के बाद बेटी के साथ मैदान में आना पड़ा।