हजरत महल का जन्म कब और कहां हुआ इस पर इतिहास खामोश है। पर उनके पिता का नाम मियां अंबर और मां का नाम मेहर अफजा था? उनके वालिद मूलत: फर्रुखाबाद के थे, पर दोस्त हुसैन अली खां बंगश के साथ लखनऊ आ गए।
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बेगम हजरत महल
- फोटो : डेमो
बंगश के दोस्त उस्ताद कुतुब अली खां अवध के युवराज वाजिद अली को सितार सिखाते थे। वाजिद अली जब अवध के नवाब बने तो उन्होंने कुतुब को भी अपने दरबार में रख लिया। कुतुब अली खां की मेहरबानी से मियां अंबर को मकबरे में दरोगा की नौकरी मिल गई। पर, कुछ ही दिन बाद उनकी मौत हो गई।
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बेगम हजरत महल
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रोशन तकी की पुस्तक ‘बेगम हजरत महल’ बताती है, ‘मियां अंबर ने अपनी बेटी मोहम्मदी बेगम को लखनऊ में महमूद नगर स्थित अपने रिश्तेदार के यहां रख दिया था। ये रिश्तेदार गठीली टोपी बनाने में माहिर थे और सिर्फ नवाबों व अमीरों के लिए ही टोपियां बनाते थे। टोपियों की खासियत यह थी कि वही पहन सकता था, जिसके लिए बनी होती थी। दूसरा पहनता तो सिर में दर्द होने लगता।
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बेगम हजरत महल
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वह युवराज के लिए भी टोपियां बनाते थे। एक बार एक टोपी पहनते ही वाजिद अली के सिर में दर्द होने लगा। इस पर एक शायर ने कहा, ‘यह टोपी शायद जूठी है। इसे पहले भी किसी ने पहना है।’ वाजिद अली शाह ने टोपी वाले की गिरफ्तारी का हुक्म दे दिया। लोग तलाशते हुए उस मकान पर पहुंचे तो वह तो नहीं मिले, लेकिन दो खूबसूरत लड़कियां जरूर मिलीं।
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बेगम हजरत महल
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इनमें एक मोहम्मदी बेगम थी। पता चला तो उन्होंने मोहम्मदी को अपने हरम में लाने को कह दिया। बुजुर्ग ने शाही परिवार से संबंध स्थापित करने की खातिर हां कर दी। यही मोहम्मदी बेगम आगे चलकर बेगम हजरत महल नाम से जानी गईं।’