मिलिए इन महिलाओं से जिन्होंने मुश्किलें आने पर नहीं हारी हिम्मत , इस तरह किया परेशानियों का सामना
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखनऊ में जन्मी। पली- बढ़ी। केडी सिंह बाबू स्टेडियम से हॉकी का ककहरा सीखा। किशोरावस्था में राष्ट्रीय स्तर पर कई मैच खेले। जूनियर लेवल पर नेशनल के दो मैच तो शादी से ऐन पहले खेले। आखिरी मैच गोरखपुर में नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे टीम के साथ खेला था। यह कहते मालती मिश्रा की आंखें चमक उठती हैं। पर, आगे जुबान थोड़ा लरजती है। कहती हैं, आठवीं कक्षा पास किया तभी विवाह हो गया। गोंडा में ससुराल है। पति खेती करते हैं। पर, पति से संबंध अच्छे नहीं रहे। 2004 में पति ने दुधमुंहे बेटे के साथ मायके ले जाकर छोड़ दिया। मेरे सामने दो रास्ते थे।
मोहताजी का रोना रोती या फिर आगे बढ़ती। मैंने बेटे के लिए अपने पैरों पर खड़ा होने का फैसला किया। हाईस्कूल तक पढ़ी। बीबीडी अकादमी में नौकरी भी मिली। पर, यह नौकरी कुछ सालों में ही छूट गई। तो लोन लेकर ई-रिक्शा खरीद लिया। बेटे को पढ़ाकर हॉकी का बड़ा खिलाड़ी बनाना है। बेटा नेशनल कॉलेज में पढ़ाई करने के साथ स्कूल स्तर के श्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ियों में शामिल हो चुका है। उम्मीद है हम कामयाब होंगे।
नक्खास इलाके में अपने बेटे-बेटियों के साथ रहने वाली तबस्सुम जहां भी ई-रिक्शा चलाती हैं। पूछने पर कहती हैं, शादी से पहले निजी कंपनियों में नौकरी भी की। शादी हुई बच्चे हुए तो खर्च भी बढ़ते चले गए। बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाने के लिए मैंने कई सालों तक ट्यूशन पढ़ाया। शौहर जमाल अहमद खान ने कई रोजगार किए। पर, गृहस्थी की गाड़ी चलाना हमेशा मुश्किल भरा बना रहा। कठिन होते पाठ्यक्रमों की वजह से ट्यूशन से पीछे हटना पड़ा।
शौहर के परिवार में जब बंटवारा हो गया तो चुनौती और बढ़ गई। पिछले साल शौहर ने अपने नाम पर कर्ज लेकर ई-रिक्शा खरीदा। अब सुबह से दोपहर बाद तक वो इसे चलाते हैं और दोपहर बाद जब बेटा स्कूल से घर आ जाता है तो मैं उसके साथ इसे लेकर सड़क पर निकल लेती हूं। बेटी अरशी जमाल को बीएससी करा रही हूं। बेटा शावेज अभी नौवीं कक्षा का स्टूडेंट है। हमें कोई शर्म नहीं। बल्कि फख्र होता है कि हम कड़ी मेहनत कर अपने बच्चों की परवरिश कर रहे हैं।