आज भी उन्हें याद है जब 14 अगस्त 1947 की रात 12 बजे भारत की आजादी घोषणा हुई। 15 अगस्त को आजाद देश की पहली सुबह बिल्कुल अलग थी। गली-गली में गजब का उत्साह, मिठाइयां बांटते लोग, घरों में मंगल गीत और जगह-जगह देशभक्ति गीतों केबीच वंदे मातरम का उद्घोष आज भी नहीं भूले हैं वो दंपती। आज हम मिलवा रहे हैं लखनऊ के ऐसे ही दंपतियों से जिन्होंने अंग्रेजी शासन देखा, आजादी का दिन देखा और वक्त के साथ बदलते हुए देश में न जाने कितने उतार-चढ़ाव देखे। जिंदगी की शाम में आज भी वे अपने जीवनसाथी के साथ आजादी की उस पहली सुबह के गीत गुनगुना रहे हैं।
मिलिए उन दंपतियों से जिन्होंने अंग्रेजी शासन देखा, ...और सुनाए उस दौर के कुछ किस्से
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यूपी कोऑपरेटिव शुगर फेडरेशन से 1992 में सेवानिवृत्त रमाकांत चतुर्वेदी और उनकी पत्नी पर्यावरणविद व समाजसेवी प्रभा चतुर्वेदी के जेहन में 15 अगस्त 1947 की वो सुबह आज भी ताजा है। रमाकांत चतुर्वेदी बताते हैं कि उस समय मेरी उम्र 14 वर्ष थी और हम लोग पीलीभीत में थे। 14 अगस्त की रात पं. जवाहरलाल नेहरू ने जब रेडियो पर देश की आजादी की घोषणा की तो हम सब घर में रेडियो से चिपके हुए उनका संदेश सुन रहे थे। रात भर मारे खुशी के सोए ही नहीं। सुबह चारों ओर जश्न का माहौल था। हालांकि देश के बंटवारे को लेकर थोड़ा सा तनाव भी था। बोले, मैं नौवीं कक्षा में था और अपने साथियों के साथ टोलियों में देशभक्ति गीतों और नारों के बीच उस जश्न में शामिल रहा।
वहीं प्रभा चतुर्वेदी का कहना है कि मेरी उम्र सात वर्ष रही होगी और उस वक्त मैं रायपुर में थी। अंग्रेजी शासन के दौरान मैं अपने पिताजी के साथ गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में शामिल होती थी। मुझे गांधी जी का वो ओजस्वी चेहरा आज भी याद है। जिस दिन देश आजाद हुआ, उस वक्त मेरे घर में शादी जैसा माहौल था। बुआ, दादी और मां पकवान बनाने में जुटीं थीं।
प्रभा और रमाकांत चतुर्वेदी का कहना है कि पिछले 30-40 वर्षों में देश में तेजी से बदलाव हुआ। सुविधाओं के नाम पर विकास तो खूब विकास हुआ लेकिन मानसिक विकास में हम पिछड़ गए। खासकर संस्कार, नैतिकता और मूल्यों में गिरावट बढ़ती ही जा रही है।
जानकीपुरम निवासी 93 साल के रामप्रसाद श्रीवास्तव आज भी जब वो दिन याद करते हैं तो शाम के वक्त भी उनकी आंखों में 15 अगस्त की सुबह जैसी रोशनी दिखती है। बताते हैं कि 1947 में हम लोग बिहार के गोपालगंज में रहते थे। हम सबने रेडियो पर जब आजादी का समाचार सुना तो पूरा गांव झूम उठा। हमारे गांव के मुखिया ने उस दिन सभी घरों में बताशे बंटवाए। पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल था। घरों में महिलाओं ने गुलगुले बनाए। आजादी के एक साल बाद ही पशुपालन विभाग में नौकरी लग गई। बाद में उत्तर प्रदेश आ गए। रिटायरमेंट से पहले लखनऊ आए और फिर यहीं के होकर रह गए।
वहीं पत्नी विमला देवी जो कि अब काफी बीमार रहती हैं याददाश्त पर जोर डालते हुए बताती हैं कि उस वक्त उनकी उम्र महज आठ साल थी। उन्हें बहुत कुछ याद तो नहीं है लेकिन इतना जरूर याद है कि उस दिन घर में खूब मिठाई बनी थी और मोहल्ले में भी खूब मिठाई बंटी थी। देशभक्ति के गीत चारों ओर गूंज रहे थे।