लाख कोशिशों के बाद भी साथी से दिल की बात न कह पाने वाले युवाओं ने आखिरकार प्रपोज-डे पर अपने नई उमंगों के साथ अपने भाव प्रकट ही कर दिए। इस दिन को सेलिब्रेट करने में उम्रदराज भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने अतीत के झरोखों से पुरानी यादों को ताजा किया तो खुशी से आंखें चमक उठीं। लमहों को यादकर दोबारा जीने की ललक उठी। बुधवार को स्कूल-कॉलेजों से लेकर पार्कों तक में प्रपोज-डे पर युवाओं का जमावड़ा रहा। प्रपोज डे पर लोगों ने अमर उजाला से साझा की अपनी यादें..
देखिए 4 कपल, शादी के 14 साल बाद भी ऐसी हैं मोहब्बतें
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प्रो. नंदकिशोर मोरे, बीबीएयू व नमिता
वर्ष 1997 में महाराष्ट्र से बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में पीएचडी करने आया था। तब नमिता भी यहीं पर पीजी की छात्रा थीं। अक्सर पढ़ाई को लेकर हम दोनों एक दूसरे से बात किया करते थे। इस बीच प्यार कब हो गया पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे हमने अपने-अपने परिवार से एक दूसरे के बारे में बताया। चूंकि हम दोनों की ही फैमिली मॉडर्न सोच रखने वाली थी इसलिए शादी में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं हुई। परिवारों की रजामंदी से 2003 में शादी हो गई। ये कहानी है बीबीएयू के पर्यावरण विभाग के प्रो. नंद किशोर मोरे की। उन्होंने बताया कि ठीक से याद नहीं कि हम दोनों में से पहले प्रपोज किसने किया था। शादी के 14 साल बाद भी वे अब भी प्रेमी-प्रेमिका की ही तरह रहते हैं। हर साल वैलेन्टाइन वीक के सभी दिनों को खूब एंजॉय करते हैं। वैलेन्टाइन डे के दिन दोनों एक दूसरे को सरप्राइज तोहफा जरूर देते हैं। आज नंद किशोर मोरे बीबीएयू में प्रोफेसर हैं और नमिता एक एनजीओ संचालिका हैं।
रूपम गौड़ व पत्नी लायला बिजनेसमैन
डालीगंज के रहने वाले लायला और व्यवसायी रूपम गौड़ एक दूसरे को बचपन से जानते थे। साथ-साथ पढ़ाई की। बचपन से ही एक दूसरे को पसंद करते थे। लेकिन हाईस्कूल में आने के बाद रूपम ने प्रपोज किया तो लायला ने भी हां कर दी। लेकिन फैसला लिया कि अपने इस रिश्ते को खुद के पैरों पर खड़ा हो जाने के बाद ही दुनिया के सामने लाएंगे। हालांकि दोनों के बीच की नजदीकियां परिवार से ज्यादा दिन तक नहीं छुप सकीं। परिवार वालों ने दोनों के मिलने पर रोक लगाने का बहुत प्रयास किया। क्योंकि लायला क्रिश्चियन थीं और रूपम हिंदू। दोनों के परिवार में मां को छोड़कर कोई भी रिश्ते के पक्ष में नहीं था। विरोध तो बहुत हुआ पर अडिग फैसले के आगे परिवार वालों की ज्यादा नहीं चली। फिर विधि-विधान से पहले चर्च में शादी हुई और उसके बाद 28 अक्टूबर, 2006 को रामाधीन लॉन में एक दूसरे कोवरमाला पहनाकर हमेशा के लिए एक दूसरे के हो गए।
उत्तर रेलवे डीआरएम एके लाहोटी व मीनू लाहोटी
रिलेशनशिप बहुत ही सेंसटिव है। खासतौर से तब जब यह लॉन्गटर्म हो। इसलिए जब पूरी तरह विश्वास हो, कंविक्शन हो, तब ही प्रपोज करना चाहिए। इसके लिए किसी पर्टिकुलर दिन का इंतजार नहीं करना चाहिए। यह कहना है उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के डीआरएम एके लाहोटी का, जो आने वाली 15 फरवरी को अपनी शादी की 29 वीं सालगिरह मनाएंगे। उन्होंने बताया कि धारणा व विश्वास भारतीय संस्कृति में है, लेकिन वैलेन्टाइन को हिन्दुस्तान ने आत्मसात कर लिया है। इसलिए युवाओं को चाहिए कि जब प्यार में विश्वास हो, तब अपने दिल की बात कह देनी चाहिए। वहीं पत्नी व उत्तर रेलवे महिला संगठन की अध्यक्षा मीनू लाहोटी ने कहा कि आज की जिंदगी भागदौड़ भरी है। युवाओं को समय ही नहीं मिलता। प्राइवेट सेक्टर में तो और भी मारामारी की स्थिति है। ऐसे में वैलेन्टाइन वीक ऐसे युवाओं को खासा उत्साहित कर देता है। रूटीन कामों से इतर जीवनसाथी के साथ वक्त बिताने का अवसर मिल जाता है।
डॉ. आशीष सिंघल व डॉ. चारू कैंसर सर्जन
वैलेन्टाइन वीक का अपना महत्व है। ये किसी पर्व से कम नहीं है। लेकिन कुछ लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। खासकर ऐसे युवा, जो प्यार को खेल समझते हैं। यह कहना है कि वैलेन्टाइन वीक को लेकर राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के कैंसर सर्जन डॉ. आशीष सिंघल का। वहीं उनकी पत्नी डॉ. चारू सिंघल भी इंस्टीट्यूट में ही डॉक्टर हैं। उन्होंने कहा कि वैसे तो वैलेन्टाइन का जो उद्देश्य है, उस लिहाज से प्यार को जाहिर करने यानी प्रपोज करने के लिए किसी दिन का इंतजार नहीं किया जा सकता। अरेंज मैरिज होने के बावजूद अनुभव लव मैरिज सरीखे हैं। असली वैलेन्टाइन मरीजों की सेवा में ही व्यतीत होता है, जिसमें आंतरिक खुशी का एहसास होता है।