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जब एक सीनियर रेंजीडेंट के कहने पर लोवर में ही हॉस्पिटल पहुंच गए केजीएमयू के ये डॉक्टर, जानें- मामला
Tue, 02 Apr 2019 10:57 AM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 02 Apr 2019 10:57 AM IST
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फर्स्ट अप्रैल यानी विश्व हास्य दिवस। लोग इस दिन दोस्तों को अप्रैल फूल बनाने के लिए सुबह से शाम तक जतन करते हैं। अप्रैल फूल के दिन ऐसे तमाम किस्से हर खास और आम के साथ जुड़े होंगे, जबकि किसी ने किसी न किसी को जिंदगी में एक बार कभी न कभी अप्रैल डे पर अप्रैल फूल जरूर बनाया होगा। अप्रैल फूल डे से एक दिन पहले अमर उजाला ने शहर के कुछ लोगों से जाना कि कैसा रहा उनका अप्रैल फूल बनने का अनुभव...।
मुकुल महान, हास्य कवि
- फोटो : amar ujala
जब पहुंचे इटावा तो कवि सम्मेलन की जगह लटकता मिला ताला
पिछले 28 वर्षों में 3500 से ज्यादा काव्य पाठ कर चुका हूं, लेकिन जैसा अप्रैल फूल इटावा वालों ने बनाया, वैसा आज तक नहीं बना। वर्ष 1998 के आसपास अप्रैल के दूसरे या तीसरे दिन की बात रही होगी। इटावा के एक कॉलेज की ओर से कवि सम्मेलन का निमंत्रण आया तो दोस्त कवि देवल आशीष (अब दिवंगत) संग वहां पहुंच गया। शाम हो चुकी थी इटावा पहुंचने पर। रात होते-होते आयोजन स्थल वो कॉलेज भी खोज लिया, लेकिन न वहां तंबू न कनात, न कुर्सी, न ही कवि सम्मेलन। ऐसा झटका लगा कि बस पूछो मत, दिन भर के थके-हारे हम परेशान। तब मोबाइल आदि का जमाना भी नहीं था। लौटे पर रेलवे स्टेशन पर कवि हृदय सम्राट स्टेशन मास्टर मि. दोहरे जी ने समझाया कि किसी ने आपको अप्रैल फूल बना दिया है। इन दिनों तो कॉलेज बंद ही रहता है, फिर उन्होंने हम लोगों को आश्रय दिया। वेटिंग रूम में ही हम तीनों की कवि सम्मेलन की महफिल जमी। चूंकि हमारे पैसे भी खत्म हो गए थे तो उन्हाेंने ही घर वापसी का प्रबंध करवाया। ये अप्रैल फूल आज भी याद रहता है।
- मुकुल महान, हास्य कवि
पिछले 28 वर्षों में 3500 से ज्यादा काव्य पाठ कर चुका हूं, लेकिन जैसा अप्रैल फूल इटावा वालों ने बनाया, वैसा आज तक नहीं बना। वर्ष 1998 के आसपास अप्रैल के दूसरे या तीसरे दिन की बात रही होगी। इटावा के एक कॉलेज की ओर से कवि सम्मेलन का निमंत्रण आया तो दोस्त कवि देवल आशीष (अब दिवंगत) संग वहां पहुंच गया। शाम हो चुकी थी इटावा पहुंचने पर। रात होते-होते आयोजन स्थल वो कॉलेज भी खोज लिया, लेकिन न वहां तंबू न कनात, न कुर्सी, न ही कवि सम्मेलन। ऐसा झटका लगा कि बस पूछो मत, दिन भर के थके-हारे हम परेशान। तब मोबाइल आदि का जमाना भी नहीं था। लौटे पर रेलवे स्टेशन पर कवि हृदय सम्राट स्टेशन मास्टर मि. दोहरे जी ने समझाया कि किसी ने आपको अप्रैल फूल बना दिया है। इन दिनों तो कॉलेज बंद ही रहता है, फिर उन्होंने हम लोगों को आश्रय दिया। वेटिंग रूम में ही हम तीनों की कवि सम्मेलन की महफिल जमी। चूंकि हमारे पैसे भी खत्म हो गए थे तो उन्हाेंने ही घर वापसी का प्रबंध करवाया। ये अप्रैल फूल आज भी याद रहता है।
- मुकुल महान, हास्य कवि
डॉ लक्ष्य कुमार, केजीएमयू
- फोटो : amar ujala
जब लोवर में पहुंचा अस्पताल
पिछले साल एक सीनियर रेजीडेंट ने हमारे साथ अप्रैल फूल मनाया। उसने बताया कि लैब में एक मरीज की तबीयत बिगड़ गई है। उस वक्त मैं कमरे पर था। मुझे यह ध्यान नहीं आया कि आज फूल डे हैं। आनन- फानन में जैसा था वैसा ही उठा और बाइक लेकर सीधे डिपार्टमेंट की लैब में पहुंच गया। यहां आने पर मरीज के बारे में पूछा तो पहले बताया गया कि अब वह ठीक है। फिर भी मेरा मन नहीं माना। मैंने कहा कि जरा उसे देख तो लूं। इस पर दूसरे रेजीडेंट्स हंसने लगे तब अचानक मुझे याद आया कि आज तो एक अप्रैल हैै। फिर रेजीडेंटों को नाश्ता कराया और लौट गया। इस बात पर मुझे जरा भी गुस्सा नहीं आया। क्योंकि मैं मरीज के लिए आया था। यही मेरा धर्म है।
- डा. लक्ष्य कुमार, केजीएमयू
पिछले साल एक सीनियर रेजीडेंट ने हमारे साथ अप्रैल फूल मनाया। उसने बताया कि लैब में एक मरीज की तबीयत बिगड़ गई है। उस वक्त मैं कमरे पर था। मुझे यह ध्यान नहीं आया कि आज फूल डे हैं। आनन- फानन में जैसा था वैसा ही उठा और बाइक लेकर सीधे डिपार्टमेंट की लैब में पहुंच गया। यहां आने पर मरीज के बारे में पूछा तो पहले बताया गया कि अब वह ठीक है। फिर भी मेरा मन नहीं माना। मैंने कहा कि जरा उसे देख तो लूं। इस पर दूसरे रेजीडेंट्स हंसने लगे तब अचानक मुझे याद आया कि आज तो एक अप्रैल हैै। फिर रेजीडेंटों को नाश्ता कराया और लौट गया। इस बात पर मुझे जरा भी गुस्सा नहीं आया। क्योंकि मैं मरीज के लिए आया था। यही मेरा धर्म है।
- डा. लक्ष्य कुमार, केजीएमयू
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रेनू दुबे, सहायक निदेशक, राज्य संग्रहालय
- फोटो : amar ujala
भाई ने सीनियर अफसर बनकर चौंकाया
मेरा छोटा भाई सिविल सर्विसेज में है। करीब 3-4 साल पहले की बात है। ऑफिस के पीएनटी पर मेरे सुपर सीनियर ऑफिसर के नाम से फोन आया। मेरी बड़ी तारीफें होने लगीं। मुझे अवॉर्ड समेत कई बातें की जाने लगी तो मुझे लगा कि कोई मुझे अप्रैल फूल तो नहीं बना रहा। थोड़ी देर की बात में जब आवाज पहचानी तो बात खुली कि भाई ने ही अप्रैल फूल बना दिया। ये किस्सा भुलाये नहीं भूलता। अपने स्कूल डेज में मैंने तो बहुतों को अप्रैल फूल बनाया, लेकिन एक वाकये ने मेरी हालत ऐसी कर दी कि उसके बाद मैंने कान पकड़ लिए कि अब अप्रैल फूल बनाना बंद। बात करीब 20-24 साल पहले की रही होगी। अल्मोड़ा में फैमिली के साथ सरकारी मकानों में रहती थी। एक अप्रैल के दिन मेरे सामने वाले फ्लैट के एक सरकारी जॉब करने वाली आंटी बाहर निकली तो मैंने उन्हें फूल बनाने के लिये चिल्ला दिया कि आंटी सांप, कोबरा...। वो बेचारी इतना घबरा गई कि सीढ़ियों से जल्दी-जल्दी उतरने के चक्कर में ऊपर से गिरने से बचीं। मुझे फटकार लगी उसके बाद तो मैंने तौबा कर ली कि किसी को अप्रैल फूल नहीं बनाऊंगी। - रेनू दुबे, सहायक निदेशक, राज्य संग्रहालय
मेरा छोटा भाई सिविल सर्विसेज में है। करीब 3-4 साल पहले की बात है। ऑफिस के पीएनटी पर मेरे सुपर सीनियर ऑफिसर के नाम से फोन आया। मेरी बड़ी तारीफें होने लगीं। मुझे अवॉर्ड समेत कई बातें की जाने लगी तो मुझे लगा कि कोई मुझे अप्रैल फूल तो नहीं बना रहा। थोड़ी देर की बात में जब आवाज पहचानी तो बात खुली कि भाई ने ही अप्रैल फूल बना दिया। ये किस्सा भुलाये नहीं भूलता। अपने स्कूल डेज में मैंने तो बहुतों को अप्रैल फूल बनाया, लेकिन एक वाकये ने मेरी हालत ऐसी कर दी कि उसके बाद मैंने कान पकड़ लिए कि अब अप्रैल फूल बनाना बंद। बात करीब 20-24 साल पहले की रही होगी। अल्मोड़ा में फैमिली के साथ सरकारी मकानों में रहती थी। एक अप्रैल के दिन मेरे सामने वाले फ्लैट के एक सरकारी जॉब करने वाली आंटी बाहर निकली तो मैंने उन्हें फूल बनाने के लिये चिल्ला दिया कि आंटी सांप, कोबरा...। वो बेचारी इतना घबरा गई कि सीढ़ियों से जल्दी-जल्दी उतरने के चक्कर में ऊपर से गिरने से बचीं। मुझे फटकार लगी उसके बाद तो मैंने तौबा कर ली कि किसी को अप्रैल फूल नहीं बनाऊंगी। - रेनू दुबे, सहायक निदेशक, राज्य संग्रहालय
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विष्णु त्रिपाठी लंकेश
- फोटो : amar ujala
हमको तो मूर्खाधिराज बना दिया गया
वैसे तो हम खुद को बहुत सयाने समझते रहे, कभी किसी को मौका तक नहीं दिया कि हमको कोई मूर्ख बना सके। लेकिन हमारी किस्मत ही देखिये कि हम मूर्ख दिवस पर नगर में होने वाले सबसे बड़े आयोजन घोंघा बसंत में ही मूर्ख बन गए, मूर्ख क्या मूर्खाधिराज बना दिए गए। बात कोई 12-15 साल पहले की है। आयोजन में हम आमंत्रित थे, आयोजन की प्रकृति से भलीभांति वाकिफ भी थे, लेकिन नहीं जानते थे कि मेहमानों को भी अजब-गजब खिताब दे दिए जाते हैं। आयोजन शुरू हुआ, हमारे शहर के रावण वाले किरदार से परिचय हुआ। मंच पर गधे का अवतरण हुआ। इन सबके बीच हमें भी मंच पर बुलवा लिया गया। गले में बेढंगी सी माला पहना दी गई और सरेआम मंच पर मूर्खाधिराज का खिताब दे दिया गया। लोग अप्रैल डे पर चुपके अप्रैल फूल बनाये जाते हैं, लेकिन हम तो सब कुछ जानते हुए तालियों के बीच शहर के मूर्खाधिराज बन गए। - विष्णु त्रिपाठी लंकेश
वैसे तो हम खुद को बहुत सयाने समझते रहे, कभी किसी को मौका तक नहीं दिया कि हमको कोई मूर्ख बना सके। लेकिन हमारी किस्मत ही देखिये कि हम मूर्ख दिवस पर नगर में होने वाले सबसे बड़े आयोजन घोंघा बसंत में ही मूर्ख बन गए, मूर्ख क्या मूर्खाधिराज बना दिए गए। बात कोई 12-15 साल पहले की है। आयोजन में हम आमंत्रित थे, आयोजन की प्रकृति से भलीभांति वाकिफ भी थे, लेकिन नहीं जानते थे कि मेहमानों को भी अजब-गजब खिताब दे दिए जाते हैं। आयोजन शुरू हुआ, हमारे शहर के रावण वाले किरदार से परिचय हुआ। मंच पर गधे का अवतरण हुआ। इन सबके बीच हमें भी मंच पर बुलवा लिया गया। गले में बेढंगी सी माला पहना दी गई और सरेआम मंच पर मूर्खाधिराज का खिताब दे दिया गया। लोग अप्रैल डे पर चुपके अप्रैल फूल बनाये जाते हैं, लेकिन हम तो सब कुछ जानते हुए तालियों के बीच शहर के मूर्खाधिराज बन गए। - विष्णु त्रिपाठी लंकेश