सुप्रीम कोर्ट का बेटियों को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही बेटे के बराबर अधिकार देने के फैसले को बड़े सामाजिक सुधार के नजरिए से देखा जा रहा है। लेकिन मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों में यह फैसला सामाजिक ताने बाने पर बड़ा असर डालने वाला साबित हो सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून, 2005 में संसद ने जब यह कानून बनाया था तब लोगों में ऐसी सामाजिक चेतना नहीं थी, जितनी इस समय है। इतने सालों में देश की बड़ी आबादी को यह तक नहीं मालूम की इस कानूनी अधिकार से क्या फर्क पड़ेगा। 2005 से ही कानून होने के बावजूद बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार को लेकर सामाजिक ताने-बाने पर खास असर नहीं पड़ा है। बहनों की ओर से पैतृक संपत्ति में दावेदारी के उतनी बड़ी संख्या में मामले नहीं आए, जिस स्तर पर आने चाहिए। वजह यह कानून तो हर घर के लिए है लेकिन समाज में बेटियों को इसका लाभ अपवाद स्वरूप बेहद सीमित संख्या में ही मिल पाया है। लिहाजा पारिवारिक संबंधों और परम्परागत सामाजिक तानेबाने पर खास फर्क नहीं पड़ा। बहन-भाई, साले-बहनोई और पिता-बेटी के रिश्ते पुरातन परंपरा की तरह जीवंत हैं। मगर, अब जबकि इस कानून पर अमल के समय से संबंधित विवाद का पटाक्षेप हुआ है, स्थितियां काफी बदली हुई हैं। पिछले डेढ़ दशक में शिक्षा व जागरूकता का स्तर बढ़ा है, और बेटियों की शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। सूचनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए मीडिया के तमाम माध्यम गांव-गांव तक उपलब्ध हुए हैं। सोशल मीडिया ने जानकारी का विशाल नेटवर्क उपलब्ध करा दिया है। यह फैसला आने के बाद से ही लोगों में इसके लाभ हानि की जानकारी को लेकर जबर्दस्त जिज्ञासा सामने आई है। लोगों में यह जानने की जिज्ञासा सबसे अधिक है कि इसका प्रभाव कृषि भूमि पर भी होगा या नहीं। किस-किस तरह की संपत्ति में बेटी हिस्से की हकदार होगी? इससे तमाम तरह की चुनौतियों की आशंका भी जताई जा रही है।
पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटे के समान हिस्सा बड़ा सुधार, ... पर सामाजिक ताने-बाने पर पड़ेगा बड़ा असर
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इस तरह समझिए हिंदू उत्तराधिकार कानून के निहितार्थ
भारतीय विधि संस्थान, नई दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अनुराग दीप कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायधीशों (पूर्ण पीठ) का हिन्दू पैतृक संपति के संबंध में दिया गया फैसला बहुत महत्वपूर्ण है। इस मामले का नाम है विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में संसद ने 2005 में संशोधन कर बेटी को भी बेटे के बराबर का अधिकार पैतृक संपति में दिया था। उस समय यह विवाद उठा था कि यह संशोधन कब लागू होगा। क्या यह 2005 के पूर्व से भी लागू हो सकता है। इस विषय पर प्रकाश बनाम फूलवती में 2016 में दो न्यायाधीश की पीठ ने निर्णय दिया कि बेटी को यह अधिकार 2005 के बाद ही मिलेगा। लेकिन दानम्मा सुमन सुरपुर बनाम अमर में 2018 में एक अन्य पीठ ने यह निर्णय दिया कि बेटी को अधिकार 2005 के पहले से मिलेगा। दो विरोधी निर्णय में कौन सा सही है, इसलिए तीन जजों की पीठ बनाई गई। विनीता शर्मा के मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह 2005 के पहले से लागू होगा। इससे चार प्रमुख बातें स्पष्ट हैं। पहला, अब कानून से पूरी तरह से तय हो गया कि बेटी को अधिकार 1956 से उसी प्रकार प्राप्त है जैसे बेटे को। दूसरा, 9 सितंबर 2005 के पहले जन्मी बेटी को भी पैतृक संपति में बराबर का हक है। तीसरा, यह आवश्यक नहीं है कि पिता 9 सितंबर,.2005 को जीवित हो। चौथा, 1956 का कानून 2005 का संशोधन या 11 अगस्त 2020 का विनीता शर्मा मामले निर्णय केवल पैतृक सम्पत्ति पर लागू है। इसमें न तो स्व अर्जित संपत्ति शामिल है और न ही कृषि संपत्ति। इस निर्णय को लेकर कई आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। मसलन, इस निर्णय के कारण परिवार में कलह और वैमनस्य बढ़ेगा। लड़की की शादी में भी बड़ा खर्च होता है, फिर उसे बेटे के बराबर का हक देना, उचित है? एक आलोचना यह की जा रही है कि बेटी की शादी के बाद उसकी संपति का उत्तराधिकारी उसके पति आदि हो जाते हैं। इस तरह यदि विवाहित बेटी की मृत्यु होती है तो दामाद उस संपति का अधिकारी होगा। यह भी तर्क किया जा रहा है कि लड़कियों पर खतरा बढ़ जाएगा। उसे संपति में एक हिस्सेदार के रूप में देखा जाएगा जो विवाह पश्चात दूसरे घर जाएगी। ये आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं। लेकिन हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष हैं। विवाद बढ़ेगा, झगड़ा बढ़ेगा यह एक पक्ष है। पैतृक सम्पत्ति में जन्म से बराबर की हिस्सेदारी से बेटी ज्यादा सशक्त होगी, सम्मान पाएगी, यह उससे बड़ा पक्ष है। हो सकता है कि कुछ समय लगे लेकिन उम्मीद है कि सकारात्मक पक्ष प्रबल रहेगा। .
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की प्रोफेसर डा. सुभि धूसिया कहती हैं कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 का मकसद संपत्ति अधिकारों में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना था। सुप्रीमकोर्ट का निर्णय निसंदेह अभूतपूर्व है। परन्तु प्रश्न व चिंता इसके दूरगामी परिणामों को लेकर है। यह निर्णय जितना प्रगतिशील है, हमारा समाज अभी उतना नहीं है। आज भी आधी आबादी पराया धन मानी जाती है, जिसे मनपंसद वर चुनने तक का अधिकार नहीं है। ऑनर किलिंग, एसिड अटैक का लैंगिक आधार पर विश्लेषण समाज के कटु रूप को ही सामने लाता है। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा व तकनीकी प्रगति से आधी आबादी अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुई है। उसमें नई चेतना का जागरण हुआ। वह अब अपने नजरिए से समाज को देख रही है। ऐसे में यह कानून उसे और मजबूत करेगा। लेकिन, ध्यान रखें की व्यक्तिगत दृढ़ता में पारिवारिक सहयोग का बड़ा हाथ है। महिला हो या पुरुष सामाजिक प्राणी होने के नाते चारों ओर से जुड़े होते हैं। इसलिए एक कदम कई रिश्तों को प्रभावित कर सकता है। संपन्न परिवारों में तो संभवतः बेटा-बेटी में संपत्ति विभाजन हो भी जाए, परंतु मध्यम गरीब परिवारों में यह कई संघर्षों का कारण बन सकता है। जहां भाई बेरोजगार है और जीविका का जरिया पारिवारिक संपत्ति है, उसमें वह बहन को हिस्सा देगा तो उसकी जीविका का क्या होगा? क्या जरूरी है कि भाई की पत्नी भी दहेज में संपत्ति लाए? क्या जरूरी है कि तब अभिभावक बेटी को दहेज दे? ऐसे कई जमीनी स्तर के प्रश्न हैं, जिसका जवाब समय देगा। कानून तो दिशानिर्देश देते हैं, उसके अनुरूप समाज निर्माण में पीढ़ियां लग जाती हैं। क्या भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन, दोनों के लिए उतना ही उत्साह पूर्ण रह पाएगा? क्या दामाद भी अपने ससुर की वही जिम्मेदारी उठाएगा, जो उसकी पत्नी का भाई उठाता है। इसका उत्तर काल के गर्भ में है। शंका परंपरागत समाज के चरमराने की है। ऐसे में नए समाज के निर्माण के लिए भी सोचना होगा। तभी मूल्यों के टकराव के बावजूद कानून व्यवहार में भी स्थायित्व पा सकेगा।
कानून को लागू करने के कुछ सुझाव
प्रो. धूसिया कहती हैं कि जिस तरह महिला शिक्षा के प्रति लोगों को जागृत करने के लिए सरकार ने तमाम जागरूकता अभियान चलाया, उसी तरीके के कुछ अभियान और प्रयास स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिलकर सरकार को करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त परिवार को भी सामाजिकरण की लिंग-भेद पर आधारित प्रक्रिया से अपने को अलग करना होगा, जिसमें ये जागरूकता प्रयास कारगर साबित होंगे। इसी तरह लड़का और लड़की दोनों को ही अपने जन्ममूलक परिवार के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्य को समान तरह से समझाना पड़ेगा। इसके अलावा यह बात भी स्पष्ट करनी चाहिए कि बेटा और बेटी दोनों में से जो भी अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा, वह पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा नहीं पाएगा। हमारे देश में अधिकतर समस्या का कारण कर्तव्य से ज्यादा अधिकार पर जोर देने से है।
समाजशास्त्र के अध्येयता डॉ. पीपी पांडेय बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से महिलाऐ और भी सशक्त होंगी। ऐसे कानून आदर्श समाज की स्थापना के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। भारत जैसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था वाले समाज में अब पैतृक संपत्ति में बेटी का जन्म से ही हक हो गया। इससे भाई-बहन के रिश्तों में प्रेम एवं विश्वास की जगह कलह एवं अविश्वास के बढ़ने की आशंका है। भावनात्मक संबंध पर आधारित रक्षाबंधन, भाई दूज जैसे संस्कार पर असर पड़ सकता है। महिलाएं अपने ससुराल में होने वाले हिंसा के खिलाफ तथा विवाह विच्छेद की स्थिति में अपने मायके को एक सुरक्षा कवच के रूप में देखती हैं। पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार होने से वह इस सुरक्षा कवच को खो भी सकती हैं। भारतीय समाज में लड़की की जगह लड़के को जन्म देने की प्रवृत्ति आज भी है। ऐसे में इस कानून के लागू होने से लड़कियों की शिक्षा व विवाह आदि पर होने वाले खर्चों में कमी आ सकती है। आज भी हमारे समाज में लड़कियों को पराया माना जाता है। संपत्ति का अधिकार मिल जाने के बाद लड़कियों के प्रति परिवार के नजरिए में बदलाव आ सकता है।
डा. पांडेय कहते हैं कि आने वाले समय में भ्रूण हत्या एवं कन्या हत्या में बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है। पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार से परिवार को यह आशंका बन सकती है कि यदि बेटी को संपत्ति में अधिकार मिल जाएगा तो वह स्वयं या अपने पति के दबाव में अपने हिस्से की संपत्ति बेच देगी। पूर्व में भी यह देखने को मिला है कि जो महिलाएं पैतृक संपत्ति में अपने अधिकार का दावा करती हैं उनमें से तमाम महिलाओं को अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है। ऐसी स्थिति में संपत्ति का अधिकार भी अन्य कानूनी अधिकारों की तरह महज सैद्धांतिक न हो, इसके लिए समाज को मानसिकता परिवर्तन के लिए कुछ प्रयास करने होंगे।
नेशनल कॉलेज ऑफ लॉ बड़हलगंज, गोरखपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर चंद्रभूषण तिवारी बताते हैं कि पैतृक संपत्ति के अंतर्गत सहदायिकी संपत्ति सम्मिलित है। इसके अंतर्गत कृषि योग्य भूमि शामिल नहीं है। इसके दायरे में पैतृक रूप से प्राप्त मकान, दुकान व व्यवसायिक भवन आदि ही सम्मिलित हैं। पुत्री को इन्हीं संपत्तियों में पुत्र के समान हक प्राप्त है। कृषि योग्य भूमि उत्तराधिकार में शामिल नहीं है। यह राजस्व संहिता द्वारा शासित होती है।
‘‘सुप्रीम कोर्ट का आदेश सिविल प्रॉपर्टी के बारे में है। कृषि भूमि के बारे में राजस्व संहिता के कानून ही लागू होंगे। इस संबंध में उत्तराधिकारियों को 16 स्टेप में विभाजित किया गया है। यदि सबसे कम स्टेप का कोई भी एक उत्तराधिकारी जीवित है, तो अगले स्टेप्स के उत्तराधिकारी का नंबर नहीं आएगा। इसी प्रकार यह क्रम आगे बढ़ता रहेगा। इसके बावजूद भी यदि कोई जीवित नहीं मिलेगा तो अंत में राज्य सरकार उत्तराधिकारी/मालिक होगी। कृषि भूमि में विवाहित पुत्री का स्टेप अविवाहित पुत्री एवं पुत्रों के स्टेप के बाद का है। - रेणुका कुमार, अपर मुख्य सचिव राजस्व