थायरॉयड, हाई ब्लड प्रेशर व शुगर के साथ थायरॉयड की समस्या से जूझ रहे मरीजों को भी ग्लूकोमा होने का खतरा ज्यादा होता है। अगर अधिक समय तक इसे नजरअंदाज किया गया तो रोशनी भी जा सकती है। यह जानकारी केजीएमयू नेत्र रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर व ग्लूकोमा विशेषज्ञ डॉ. रजत मोहन श्रीवास्तव ने दी है।
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डॉ. रजत ने बताया कि ग्लूकोमा के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। केजीएमयू के नेत्र रोग विभाग में ओपीडी में आने वाले मरीजों में 20 प्रतिशत मरीज ग्लूकोमा के आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि केजीएमयू की नेत्र रोग ओपीडी में हर दिन करीब 200 मरीज आते हैं। इनमें से 20 प्रतिशत से भी अधिक मरीज ग्लूकोमा के होते हैं।
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ग्लूकोमा के मरीजों में भी 20 प्रतिशत मरीजों में ट्रेबिक्युलेक्टमी (ग्लूकोमा के लिए सर्जरी) की जरूरत पड़ती है। इसका प्रमुख कारण इलाज में देरी है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी 40 साल की उम्र के बाद फैलती है। ऐसे में 40 की उम्र के बाद हर साल ग्लूकोमा की जांच करानी चाहिए।
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उन्होंने बताया कि केजीएमयू में वर्ल्ड ग्लूकोमा वीक सोमवार से मनाया जाएगा। डॉ. रजत ने बताया कि नवीनतम आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 60 मिलियन मरीज ग्लूकोमा से पीड़ित हैं। जिसके 20 प्रतिशत से भी अधिक करीब 11 मिलियन मरीज केवल भारत से हैं।
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जानिए, क्या होता है ग्लूकोमा
ग्लूकोमा आंखों की एक बीमारी है। इसे काला मोतिया भी कहा जाता है। आंख गुब्बारे की तरह होती है। इसके अंदर एक तरह का तरल पदार्थ भरा होता है। यह तरल पदार्थ आंखों के अंदर बनता रहता है और बाहर निकलता रहता है। ग्लूकोमा में यह तरल पदार्थ आंखों से बाहर नहीं निकल पाता है, जिससे आंखों पर दबाव बनने लगता है। आंखों पर पड़ा दबाव ऑप्टिक नर्व को डैमेज करने लगता है। धीरे-धीरे आंखों की रोशनी कम होने लगती है। अगर इसके लक्षणों को नजरअंदाज किया तो अंधापन भी हो सकता है।