मशहूर निर्देशक विशाल भारद्वाज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ओमकारा, हैदर, मकबूल, इश्किया...उनकी ऐसी फिल्में हैं, जो उनकी शख्सियत को एक नए मुकाम पर पहुंचाती हैं। वह लेखक हैं और म्यूजिशियन भी। पर, उन्होंने रविवार को जब अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को परत दर परत दर्शकों से साझा किया तो शाम यादगार बन गई। दरअसल, विशाल भारद्वाज रविवार को गोमतीनगर स्थित एक होटल में आयोजित ‘संगत विद विशाल भारद्वाज’ कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लखनऊ आए थे।
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विशाल भारद्वाज
- फोटो : amar ujala
लेखक यतींद्र मिश्र ने विशाल से उनके संगीत केसफर के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि बचपन से ही धुनें बनाने की धुन सवार थी। चूंकि, पिता राम भारद्वाज सरकारी मुलाजिम थे, उन्हें कविताएं लिखने का शौक था। इसलिए शुरुआती दौर में उनकी कविताओं पर धुनें बनाता था जो बहुत पसंद की जाती थीं।
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विशाल भारद्वाज
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फिर पिताजी ने ऊषा खन्ना जी से मिलवाया तो संगीत का कारवां एक नए मुकाम पर पहुंच गया। बताया कि चांदपुर, बिजनौर में जन्म हुआ। नजीबाबाद में प्रारंभिक शिक्षा ली। फिर मेरठ से इंटरमीडिएट कर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली गया। विशाल ने कहा कि मेरठ में जीवन का लंबा अरसा बिताया है। लिहाजा ओमकारा में मेरठ की भाषा इस्तेमाल हुई है। ठेठ बोली से लबरेज लंगड़ा त्यागी का किरदार फिल्म की शान रहा।
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कार्यक्रम में मौजूद लोग
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गीतकार गुलजार पर लंबी सांस लेते हुए विशाल ने कहा कि गुलजार साहब से मिलना मेरी जिंदगी का सबसे खुशगवार लम्हा था। कार्यक्रम के दौरान बैंड पर छई छप्पा छई छप्पा की छई..., दिल तो बच्चा है जी..., चुपड़ी चुपड़ी चाची..., हमरी अटरिया पे आजा रे सांवरिया..., नमक इश्क का...गीतों की प्रस्तुतियों ने शाम को यादगार बना दिया।
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कार्यक्रम
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‘डालीगंज में रहती थीं मेरी मौसी’
विशाल भारद्वाज ने बताया कि मैंने गांव को करीब से देखा है। इसलिए मेरी फिल्मों में गांव अधिक दिखता है। पिछले दस वर्षों से न्यूयॉर्क व लंदन देख रहा हूं, जब नई फिल्म बनाऊंगा तो यह भी दिखाई देगा। जो जिंदगी से जुड़ा होगा, उस पर ही फिल्म बनाऊंगा। कहा, जो आपके पास हो उसी में खुश रहना चाहिए। जो नहीं है, उसका गम नहीं करना चाहिए। बताया,इस समय बायोपिक अधिक बन रही हैं। यह ट्रेंड में है। जो फिल्में बन रही हैं, वे अधिकतर ओरिजनल हैं।