आप लखनवी हैं, लेकिन जैसे ही घूमने के लिए जू, पार्क या दूसरी धरोहरों पर जाते हैं तो पर्यटक विभाग आपको पर्यटकों की सूची में दर्ज कर देगा। आप जितनी बार घूमेंगे, उतनी बार पर्यटक बनेंगे। बाकायदा पर्यटन विभाग के आंकड़ों में शामिल होंगे।
लखनऊ का पर्यटन ऐसे ही आंकड़ों पर बढ़ रहा है। दरअसल, पर्यटन विभाग के पास पर्यटकों की सही संख्या दर्ज कराने का कोई फार्मूला ही नहीं है। इन्हीं फर्जी आंकड़ों के चलते सालाना औसतन 49.28 लाख पर्यटकों की संख्या राजधानी में दिखाई जाती है, जिसकी वाहवाही अधिकारी लूटते हैं। पर, सच्चाई इन आंकड़ों से काफी इतर है, जिस पर न तो पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा जोशी का ध्यान जा रहा है और न ही केंद्र सरकार का।
मालूम हो कि उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग घरेलू व विदेशी पर्यटकों की संख्या जुटाता है। इसमें विदेशी पर्यटकों की संख्या तकरीबन सही रहती है, लेकिन घरेलू पर्यटकों की संख्या में फर्जीवाड़ा होता है। इसकी वजह पर्यटकों का सही डाटाबैंक नहीं होना है। पर्यटन विभाग आंकड़े तैयार करने के लिए चिड़ियाघर, एयरपोर्ट, लखनऊ महोत्सव जैसे उत्सवों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्कों पर निर्भर रहता है, जहां बिकने वाले टिकटों की संख्या को पर्यटकों की संख्या में जोड़ दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त पर्यटन विभाग होटलों, रेस्टोरेंटों व गेस्ट हाउसों में आने वालों की संख्या भी लेता है, जबकि विशेषज्ञों की मानें तो पर्यटक उसे माना जाना चाहिए, जो बाहर से आए और कम से कम एक रात आपके शहर में बिताएं। वन नाइट स्टे होना जरूरी है।
सिर्फ विदेशी पर्यटकों की होती है सही जानकारी
जब विदेशी शहर घूमने आते हैं तो लोकल इंटेलीजेंस यूनिट (एलआईयू) की रिपोर्ट मिलती है। साथ ही होटलों व एयरपोर्ट से भी सटीक जानकारी मिल जाती है।