कैंसर पीड़ितों को मिलेगी राहत, नई खोज से इलाज होगा आसान, ऐसे करें पहचान
लार ग्रंथि के कैंसर का अभी तक माकूल इलाज नहीं हो पाता था। इसका पता अंतिम दौर में चलता था। ऐसे में मरीज को बचाना मुश्किल होता था। लगातार आ रहे मरीजों को देखते हुए एसजीपीजीआई की पैथोलॉजी में फाइनल निडिल एस्पिरेशन साइटोलॉजी (एफएनएसी) टेस्ट रिपोर्ट का अध्ययन किया गया। संस्थान के 350 मरीजों की जांच की गई। 20 से 60 साल वाले मरीजों की रिपोर्ट के आधार पर अध्ययन हुआ।
इसके तहत निडिल से लार ग्रंथि में बने ट्यूमर (गांठ) के नमूने लिए गए। जांच रिपोर्ट को अमेरिकन सोसाइटी ऑफ साइटो पैथोलॉजी और अंतरराष्ट्रीय एकेडमी ऑफ साइटोलॉजी द्वारा विकसित की गई तकनीक मिलान सिस्टम फॉर रिपोर्टिंग सलिवरी ग्लैड साइटोपैथोलाजी (एमएसआरएसजीसी) पर परखा गया। इसे सात कैटेगरी में बांट कर कैंसर की स्थिति की जानकारी ली गई। यानी कितने मरीजों में कितने प्रतिशत कैंसर है। उदाहरण के तौर पर किसी मरीज में 70 फीसदी कैंसर है तो उसका उसी हिसाब से इलाज किया जा सकेगा।
एसजीपीजीआई पैथोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रामनवल राव ने मिलान सिस्टम को संस्थान में लागू किया। 350 मरीजों की शोध रिपोर्ट के आधार पर उनका इलाज शुरू हुआ। इसके लिए उन्हें पिछले माह ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय साइटोलॉजी कांग्रेस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय फैकल्टी स्पीकर के रूप में आमंत्रित किया गया, जहां उन्हें सर्वश्रेष्ठ ई-पोस्टर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। भारत से जाने वाले वह इकलौते प्रोफेसर थे।
हर व्यक्ति के मुंह में लार ग्रंथियां होती हैं। प्रमुख लार ग्रंथि के तीन जोड़े छोटी ग्रंथियां होती हैं। इन्हें पैरोटोइड, सबमंडीबुलर और सबलिंगुअल ग्रंथियां कहा जाता है। ये मुंह में लार बनाती हैं। लार से भोजन नम बनता है, जिससे इसे चबाने और निगलने में मदद मिलती है। यह भोजन पचाने में भी मदद करता है। इसमें एंटीबॉडी होते हैं जो रोगाणुओं को मार सकते हैं। लार ग्रंथियों में किसी तरह की समस्या आने पर उसमें सूजन आ जाती है। धीरे-धीरे यह कैंसर ट्यूमर बन जाती हैं।