लड़कियों की सुरक्षा के लिए क्या होना चाहिए? उनके साथ हो रही हिंसा कैसे थमेगी? परिवार, समाज और खुद उनकी क्या भूमिका हो सकती है? बेटियों की सुरक्षा को लेकर ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब शनिवार को ‘अमर उजाला’ की ओर से आयोजित अपराजिता संवाद कार्यक्रम के दौरान राजधानी की महिलाओं व युवतियों ने तलाशने का प्रयास किया।
परिवार और समाज समझें अपनी जिम्मेदारी तो रुके महिलाओं पर हिंसा
बाल कल्याण समिति की सदस्य डॉ. संगीता शर्मा ने कहा कि यह बात लगातार कही जा रही है कि महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध, खासकर हिंसा के मामले बढ़े हैं। मेरा मानना है कि इस प्रकार के मामलों की रिपोर्टिंग बढ़ी है और यह अच्छी बात है। इससे हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। यह ग्राफ अभी भले ही ऊपर चला जाए, लेकिन यह नीचे भी आएगा।
ताहिरा हसन, सोशल एक्टिविस्ट ने कहा हमारा सामना ऐसी सोच से है, जो आरोपियों को बचाने के लिए लड़कियों के कपड़ों से लेकर उनके खाने-पीने तक को दुष्कर्म की वजह बताने से नहीं चूकते। लखनऊ में चार साल की बच्ची से दुष्कर्म हो जाता है, सोचिए इस प्रकार के मामलों में भी क्या पीड़िता का दोष तलाशा जाएगा?
तलाक-हिंसा को महिला की प्रतिष्ठा से न जोडे़ं :डॉ. सुप्रिया सिंह, शिक्षाविद्
आज भी हमारे समाज में यह सोच मौजूद है कि अगर किसी महिला का तलाक हो जाए तो इससे उसके परिवार की प्रतिष्ठा खराब होती है। अगर वह किसी हिंसा से पीड़ित है तब भी यही सोचा जाने लगता है जबकि पुुरुष के साथ ऐसा नहीं है। यह खत्म होना चाहिए।
अब हर रोज छह मामले : शालिनी माथुर, सुरक्षा की निदेशक
हमने लखनऊ में 1984 में महिलाओं के दहेज हत्या के खिलाफ मामलों को लड़ना शुरू किया, उस साल न कानून हमारे पास था, न पुलिस कुछ कर पाती थी। पूरे साल छह मामले आते थे। आज चीजें बदली हैं, हर रोज छह मामले आ रहे हैं, लेकिन हिंसा नहीं थम रही।
घरेलू हिंसा के खिलाफ सख्त कदम जरूरी : सदफ जफर, शिक्षाविद् और कार्यकर्ता
मैं खुद हिंसा या कहें घरेलू हिंसा की भुगतभोगी रही हूं। इसी वजह से मानती हूं कि औरतों को शक्ति से इसका विरोध करना चाहिए। साथ ही हमें फेमिनिज्म को सही परिभाषित करना होगा ताकि इसके जरिये समाज को सुधारे रखने का बीड़ा केवल महिलाओं के माथे ही न मढ़ा जाए।
खुद रिपोर्ट करें मामले : बेगम शहनाज, सामाजिक कार्यकर्ता
लड़कियां जब तक अपनी समस्याएं खुद रिपोर्ट नहीं करेंगी, हिंसा खत्म नहीं होगी। मेरा मानना है कि उन्हें आगे बढ़ना है तो दुख और हिंसा को सहते रहने की आदत छोड़नी होगी और आवाज बुलंद करनी होगी।
आसपास छिपे भेड़ियों से सावधान करना होगा : वर्षा वर्मा, कवयित्री
अक्सर महिलाओं को कहा जाता है कि घर सुरक्षित हैं और बाहर भेड़िए हैं, लेकिन इसके उलट हमें घरों के आसपास और रिश्तेदारों व परिचितों में छिपे भेड़ियों के बारे में उन्हें सजग रखना होगा। सबसे बढ़कर खुद महिलाओं को खुद को कमजोर मानना छोड़ना होगा, अपनी शक्ति पहचाननी होगी।
सभी महिलाएं बनें एक-दूसरे की सहयोगी
अंशु भटनागर, होममेकर
कई दफा ऐसा भी देखने में आता है कि अगर कोई महिला अपने प्रति हो रहे अत्याचारों की आवाज उठाती है तो उसे कुछ महिलाएं ही नीचा दिखाने का प्रयास करती हैं। इसके बजाय, अगर उसे सपोर्ट किया जाए तो 50 प्रतिशत मामले और समस्याएं खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी, विशेष रूप से महिला हिंसा की।