सपा में आंतरिक कलह के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को क्या हासिल हुआ...। इस पर भले ही हर किसी के अपने-अपने विचार हों पर एक बात तो साबित हो ही गई कि वो पार्टी नेतृत्व के हर फैसले को मानने के लिए मजबूर नहीं हैं।
वह सरकार चलाने के लिए जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं और किसी की भी नाराजगी की उन्हें फिक्र नहीं है। लगभग चार दिनों तक चले पॉलिटिकल ड्रामे में समझौते के लिए उन्हें भले ही अपने फैसले वापस लेने पड़े हों पर उन्होंने साबित कर दिया कि वह 'रबर स्टैंप' नहीं हैं।
उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद पर चाचा शिवपाल यादव के नाम पर सहमति तो दे दी लेकिन टिकट बांटने में अपने दखल को भी उन्होंने पार्टी नेतृत्व से मनवा लिया।
अखिलेश ने भ्रष्टाचार के आरोपी व मुलायम के करीबी गायत्री प्रजापति व राजकिशोर को बर्खास्त किया और फिर चाचा शिवपाल के करीबी कहे जाने वाले दीपक सिंघल को मुख्य सचिव पद से हटाकर मैसेज दे दिया कि वह कड़े फैसले करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाये जाने के बाद अगर वह चुप रह जाते तो यही मैसेज जाता कि वह मुख्यमंत्री भले ही हों पर फैसलों के लिए वह पूरी तरह पार्टी नेतृत्व के दबाव में ही रहते हैं, लेकिन उन्होंने कैबिनेट मंत्री शिवपाल से कई विभाग वापस लेकर कड़ी प्रतिक्रिया की।