विश्व रंगमंच दिवस: इन्होंने दुनिया में मनवाया अपने अभिनय का लोहा, पढ़िए बेहतरीन किस्से
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स्थानीय कलाकारों को नहीं मिलता है सम्मान
जम्मू-कश्मीर के कलाकारों को वह प्लेटफार्म और सम्मान नहीं मिलता है, जैसा बाहरी राज्यों के कलाकारों को मिलता है। वार्षिक ड्रामा फेस्टिवल की व्यापक स्तर पर तैयारी की जाती है, लेकिन उसमें दर्शकों का अभाव रहता है। दूसरे राज्यों के कलाकार यहां आकर प्रस्तुति देते हैं, तो उसमें काफी भीड़ होती है। इसकी वजह से स्थानीय कलाकारों का मनोबल प्रभावित होता है। - तरुण शर्मा, संस्थापक, नटमंच
सरकारी सुविधाओं पर निर्भर आज की प्रस्तुतियां
वर्तमान में रंगमंच का दायरा सरकारी सुविधाओं तक सिमट गया है। कलाकारों में अभिनय के प्रति समर्पण पहले जैसा नहीं दिखता। रंगमंच को जानने की ललक भी कम हुई है। पहले रंगमंच की बारीकियों पर ध्यान दिया जाता था। आज के रंगमंच में सामंजस्य की भी कमी है। कलाकारों का लोगों से जुड़ाव नहीं होता। वह लोगों के बीच नहीं जाते। इसकी वजह से रंगमंच से दर्शक दूर होते जा रहे। - विजय मल्ला, संस्थापक, एकसाथ रंगमंडल
तकनीकी विकास के बीच रंगमंच जनमानस के कितना करीब
इक्कीसवीं सदी की दो दहाइयां पार करने के बाद जब हम रंगमंच के बारे में सोचते हैं, तो देखते हैं कि रंगमंच ने तकनीकी विकास की ऊंचाइयों को छू लिया है, लेकिन आज का रंगमंच आम जनमानस के उतना करीब नहीं है, जितना कभी हुआ करता था। विश्व रंगमंच दिवस पर इन्हीं पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं वरिष्ठ रंगकर्मी और साहित्य प्रेमी मोहन सिंह...
रंगमंच ने सदियों से लोगों का मनोरंजन किया है, लेकिन कोरे मनोरंजन से सदा दूर रहा है। चाहे वह विलियम शेक्सपियर का रंगमंच हो या भारतीय संस्कृति से जुड़ा रंगमंच। रंगमंच ने सामाजिक सरोकारों का निर्वाह किया है और जनमानस में जागृति लाने की कोशिश की है। बेशक रंगमंच के कलाकारों के सामने जीविका का प्रश्न भी रहा है। चाहे वह लोक रंगमंच के कलाकार हों या आधुनिक रंगमंच के। जीविका के सवाल ने हमेशा ही उन्हें परेशान किया है। इसके बावजूद उन्होंने रंगमंच की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और फटेहाल जीवन बिताते हुए भी रंगमंच को सामाजिक, सांस्कृतिक तथा क्षेत्रीय सरोकारों से जोड़े रखा। हर एक क्षेत्र विशेष के कलाकारों का योगदान इसमें अमूल्य रहा है। आज रंगमंच अपनी पहचान राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पटल पर बना रहा है। उसकी पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय रंगमंच और लोक रंगमंच का ही तो योगदान है।
डुग्गर में रंगमंच को जीवित रखने में जिन लोक कलाकारों ने सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी अपना योगदान दिया और इस विरसे को हम तक पहुंचाया, वह आज गुमनामी के गर्त में हैं। गांव-गांव में होने वाला रामलीला रंगमंच और उसकी झलकियां उद्देश्यपूर्ण और सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत थीं। कुंदन लाल सहगल को पूरा विश्व जानता है। वे न सिर्फ गायक बल्कि महान अभिनेता भी थे। कुंदन लाल सहगल डुग्गर के क्षेत्रीय रामलीला रंगमंच की देन हैं। हास्य अभिनेता ओम प्रकाश और सुंदर भी इसी डुग्गर के क्षेत्रीय रंगमंच की देन हैं। तब से आज तक डुग्गर की धरती के कितने ही कलाकारों ने रंगमंच के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया है।