जम्मू-कश्मीर : डुग्गर आंगनों में आज नहीं सुनाई देती गौरेया की चहचहाट
मोबाइल टावर के रेडिएशन को भी चिड़ियां के कम होने का कारण माना गया है। वहीं, खेतों में कीटनाशकों व कृत्रिम खादों का ज्यादा प्रयोग भी चिड़ियां के अंगों की कार्यक्षमता कम कर देता है, जो उनकी मौत की वजह बनती है।
इसके अलावा पेड़ों के तेजी से कटने के कारण चिड़ियों को घोंसले बनाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा है। चिड़िया फसलों में पाए जाने वाले कीड़े मकोड़ों को खाकर फसलों को बचाने का काम करती है, लेकिन मौजूदा दौर में फसलों में अधिकतर कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत के साथ ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में चिड़िया को दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में रखा गया।
पक्षियों की सेवा करें लोग
डोगरा सदर सभा के अध्यक्ष व पक्षियों की सेवा में जुटे गुलचैन सिंह चाढ़क ने बताया कि पक्षी पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन जंगलों का लगातार कटान, प्रदूषण, पेयजल संकट, खानपान के अभाव आदि समस्याओं के कारण कई दुर्लभ पक्षी लुप्त होते जा रहे हैं।
सभी लोगों को गौरेया के संरक्षण के लिए अपने आंगन में प्याले रखकर उसमें पानी और उनके लिए दाना आदि डालना चाहिए, ताकि वे शहरों में भी रह सकें।
यह भी पढ़ें- जम्मू-श्रीनगर हाईवे बंद होने पर अब नहीं होना पड़ेगा अमरनाथ यात्रियों को परेशान, रामबन में बढ़ेंगी आवासीय सुविधाएं