पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर होने वाली लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के अधिकारियों की बैठक पर देश-दुनिया के साथ चुशुल के ग्रामीणों की खास तौर पर निगाहें टिकी हैं। चुशुल के मोलदो बॉर्डर मीटिंग प्वाइंट पर होने जा रही इस बैठक का सबसे पहला सरोकार एलएसी से बिल्कुल सटे ग्रामीणों का है। चुशुल समेत पैंगोंग झील से लगते सात गांवों की आबादी पिछले एक महीने से दोनों तरफ की सेनाओं का जमावड़ा देख रही है।
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लद्दाख
- फोटो : सोशल मीडिया
इन गांवों के लोग दोनों ओर की सैन्य टुकड़ियों में पहले भी कई बार तनातनी और छिटपुट झड़पों की गवाह बन चुके हैं, लेकिन इस बार के हालात से ग्रामीण भी सहमे हुए हैं। लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चुशुल से एक्जीक्यूटिव काउंसलर कुनचोक स्टैंजिन के अनुसार, पैंगोंग झील किनारे सैन्य तनातनी के माहौल को आसपास के ग्रामीण करीब से महसूस कर रहे हैं। ग्रामीण चीन की हरकत भी देख रहे हैं और जवाबी कार्रवाई के लिए भारतीय सेना की तैयारी को भी। बैठक में क्या कुछ निकलता है, उसका सबसे पहला असर यहां के बाशिंदों पर पड़ेगा। ऐसे में सभी की नजरें शनिवार को चुशुल में होने वाली बैठक पर टिकी हुई हैं।
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पैंगोंग झील से सटी मन पैंगोंग (ए) और मन पैंगोंग (बी) पंचायत में कुल सात गांव आते हैं। इनकी कुल आबादी ग्यारह सौ के करीब है। दोनों ही पंचायतें उस स्थान से बिल्कुल सटी हुई हैं, जहां दोनों ओर की सेनाओं के बीच सबसे ज्यादा तनातनी का माहौल बना हुआ है।
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पैंगोंग झील से सटे आठ पहाड़ हैं। झील पर इनकी तलहटी को फिंगर (अंगुली) कहा जाता है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार भारतीय सेना फिंगर-1 से लेकर फिंगर-8 तक गश्त करती रही है।
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इस बार फिंगर-4 पर दोनों सेनाएं आमने-सामने हैं। एक्जीक्यूटिव काउंसलर कुनचोक स्टैंजिन के अनुसार ग्रामीणों की भेड़, बकरियों और याक के लिए सर्दियों में फिंगर-4 ही एकमात्र चरागाह है।