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हिमस्खलन में रेस्क्यू करने वाली टीम होती है बेहद खास, एक योद्धा पर खर्च होते हैं लाखों रुपये
Tue, 19 Nov 2019 02:12 AM IST
Pranjal Dixit
प्रांजल दीक्षित, जम्मू
प्रांजल दीक्षित, जम्मू
Published by: Pranjal Dixit
Updated Tue, 19 Nov 2019 02:12 AM IST
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हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल की रेस्क्यू टीम
- फोटो : अमर उजाला
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हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) के प्रशिक्षक के अनुसार जब भी कभी एवलांच आता है, तो उसके लिए दो टीमें स्टैंड-बाय पर रहती हैं। एआरटी ब्रीफिंग रूम में उनका सामान हर समय उनके बैग्स में तैयार रहता है। जैसे ही हिमस्खलन होता है, तो पहले उन्हें एआरटी ब्रीफिंग रूम में ले जाकर सभी बातें स्पष्ट की जाती हैं।
हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल की रेस्क्यू टीम
- फोटो : अमर उजाला
जैसे एवलांच की लोकेशन क्या है? घटनास्थल तक उन्हें कैसे पहुंचाया जाएगा? हिमस्खलन में कितने जवान दबे हुए हैं? आदि। जैसे ही यह सब बातें उन्हें पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती हैं, तो यह जवान अपना पहले से तैयार सामान को लेते हैं और उन्हें हेलीकाप्टर या अन्य किसी साधन से घटनास्थल तक पहुंचाया जाता है।
हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल की रेस्क्यू टीम
- फोटो : अमर उजाला
हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) के कमांडेंट ने बतया कि इस स्कूल में ट्रेनिंग दी जाती है कि जवानों को हाई एल्टीट्यूड, सुपर हाई एलटीट्यूड, स्नो बाउंड या फिर ग्लेशियर वाले क्षेत्र में कैसे कार्य करना है। यहां जवानों की ट्रेनिंग की दो सीरीज चलती है। एक को माउंटेन वारफेयर सीरीज कहा जाता है और दूसरी विंटर वारफेयर सीरीज कहलाती है।
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हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल की रेस्क्यू टीम
- फोटो : अमर उजाला
माउंटेन वारफेयर ट्रेनिंग में आठ हफ्ते की इनिशियल ट्रेनिंग और चार हफ्ते की एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है, जबकि विंटर वारफेयर ट्रेनिंग में नौ हफ्ते की इनिशियल ट्रेनिंग और तीन हफ्तों की एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है।
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हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल की रेस्क्यू टीम
- फोटो : अमर उजाला
कुल मिलाकर देखें तो एक जवान को पूरी तरह से सक्षम बनाने के लिए करीब छह महीने की कठिन ट्रेनिंग दी जाती है। इस दौरान जवानों को सुपर हाई एल्टीट्यूड और ग्लेशियर एरिया में भी ले जाया जाता है, ताकि सियाचिन या फिर मिलती जुलती रणभूमि में जरूरत होने पर भेजा जा सके।