14 मई को मदर्स डे है। आप को शहर की कुछ ऐसी महिलाओं से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने न सिर्फ बेहतर तरीके से घर-बार संभाला है बल्कि पति और पिता के कारोबार में भी मजबूती से हाथ बंटा रहीं हैं। उद्यमिता, स्कूल, कारोबार हो या फिर नौकरी करते हुए ये महिलाओं तमाम चुनौतियों को चुटकियाें में निपटा देती हैं।
Happy Mother's Day: ये हैं समाज के लिए प्रेरक, जो संभालती हैं घर-परिवार के साथ अपना कामकाज
सुबह परिवार के लिए नाश्ता बनाने से लेकर खिलाने की जिम्मेदारी को कुशलता के साथ निभाती हैं और इसके बाद अपने कामकाज पर ध्यान फोकस रहता है। प्रस्तुत है चुनौतियों से लोहा लेने और अपने दम पर जीने का माद्दा रखने वाली ऐसी ही कुछ महिलाओं की कहानी।
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पति के साथ मैंने कारोबार भी संभाला
गीडा महिला उद्यमी मिताली जालान ने कहा कि गीडा में अंकुर सरिया की फैक्ट्री है। पति अंकुर जालान व्यापार के सिलसिले में जब शहर के बाहर रहते हैं तो उद्योग का कामकाज भी संभालती हूं। कारोबार की जिम्मेदारी भी संभालने के साथ व्यावसायिक नजरिये से सभी पहलुओं का ध्यान देती रहती हूं। दो बच्चे हैं, जिनका पूरा ध्यान रखना पड़ता है। उनके पढ़ने, खेलने का ध्यान रखती हूं और उनके साथ कुछ समय जरूर गुजारती हूं। सच कहूं तो बच्चों और पति के दोस्त की भूमिका भी निभाती हूं।
मां, पत्नी और चिकित्सक तीनों भूमिका में हूं फिट
कर्व डेंटल क्लीनिक दंत चिकित्सक अर्पिता सिंह ने कहा कि एक महिला की जिंदगी बहुत जीवटता वाली होती है। हमें घर को भी संभालना है और पेशे को भी। पति मनीष सिंह चौहान भी पेशे से चिकित्सक हैं। वर्तमान में इनकी तैनाती देवरिया में है। सुबह उठते ही पहले बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना और फिर पति के लिए लंच बनाना, रोजाना की दिनचर्या में शामिल है। इसके बाद खुद की भी तैयारी करनी होती है। क्लीनिक में जब कभी मरीजों की भीड़ ज्यादा होती है तब बीच-बीच में फोन करके बच्चों से बात कर लेती हूं।
पहले जिम्मेदारी अधिक थी, अब तो बेटे भी सहयोग कर रहे
नक्क्ष इंडस्ट्री गीडा की निदेशक अनीता अग्रवाल ने कहा कि पति की सराफा की दुकान थी। मैं भी कुछ करना चाहती थी, लिहाजा बेतियाहाता में लैक्मे सलून खोल लिया। इसी बीच पति ने कुछ वर्षों पहले गीडा में फैक्ट्री खोल दी। यह दौर मेरे लिए बहुत ही कठिनाइयों भरा था क्योंकि अपने कारोबार को संभालने के साथ बच्चों की भी देखभाल करनी थी। लेकिन, जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए घर की जिम्मेदारी भी कुछ कम होती गई। बेटा अब कारोबार में सहयोग करने लगा है। मेरी सुबह घर पर मां की भूमिका से शुरू होती है और पूरे दिन फैक्ट्री संभालने में लगती है।
73 की उम्र भी प्रिंसिपल की भूमिका, कभी खुद को रिटायर्ड नहीं माना
स्कूल ऑफ नर्सिंग गंगोत्री देवी की प्राचार्या लौरिटा याकूब ने कहा कि मैं मेडिकल कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद भी पढ़ा रही हूं, जो लोग खुद को रिटायर्ड मान लेते हैं वह मन से भी सेवानिवृत्त हो जाते हैं। मेरी दिनचर्या पहले जैसी ही है। सुबह जगने के बाद सबसे पहले बेटे के लिए नाश्ता तैयार करती हूं। इसके बाद बहू के काम में हाथ बंटाती हूं। प्रोफेसर बेटे के कॉलेज जाने बाद खुद तैयार होकर अपने कॉलेज आ जाती हूं। 73 साल की होने के बाद भी स्कूल ऑफ नर्सिंग, गंगोत्री देवी में प्राचार्या हूं। परिवार और समाज के लिए कोई व्यक्ति कभी रिटायर नहीं होता है।