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तस्वीरें: लॉकडाउन में छूटी नौकरी तो आर्थिक रूप से टूट गए थे ये लोग, जानिए कैसे बन गए आत्मनिर्भर
Fri, 01 Jan 2021 09:25 AM IST
vivek shukla
संवाद न्यूज एजेंसी, महराजगंज।
संवाद न्यूज एजेंसी, महराजगंज।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 01 Jan 2021 09:25 AM IST
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स्वरोजगार कर आत्मनिर्भर बन गए ये लोग।
- फोटो : अमर उजाला।
कोरोना काल में भी लोगों ने हार नहीं मानी। लॉकडाउन में रोजगार छूटने के बाद भी कई लोग सीमित संसाधनों से जूझते हुए स्वरोजगार कर आत्मनिर्भर बन चुके हैं। कल तक उनपर तंज कसने वाले भी उनकी मेहनत की प्रशंसा कर रहे हैं। अन्य युवा भी स्वरोजगार कर आगे बढ़ने की जद्दोजहद में जुटे हैं।
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सब्जी की दुकान में बैठे सलीम राइन।
- फोटो : अमर उजाला।
भगतपुरवां गांव के सलीम राइन कोरोना काल में आर्थिक रूप से टूट गए थे, लेकिन हार नहीं मानी। आत्मनिर्भर बनने के लिए ठानी तो पीछे नहीं हटे। वह बताते हैं कि मुंबई में कपडे़ की बुनाई करते थे। हर माह 12 हजार से अधिक की आमदनी थी। परिवार में सात सदस्य हैं। लॉकडाउन में काम बंद हुआ तो घर आ गए। रास्ते में दुश्वारियों से मन टूट गया। परिवार के सदस्यों द्वारा एकत्र रकम से छोटी सी फल-सब्जी की दुकान खोली। अब करीब 20 हजार से अधिक प्रत्येक माह आमदनी होती है। परिवार के सदस्य भी खुश हैं। अब मुंबई जाने की जरूरत नहीं है।
चाय की दुकान में मिथिलेश मद्धेशिया।
- फोटो : अमर उजाला।
डगरुपुर गांव के मिथिलेश मद्धेशिया सऊदी में एक कंपनी में काम करते थे। कोरोना महामारी में घर आए तो दोबारा विदेश जाने की इच्छा नहीं हुई। उन्होंने बताया कि परिवार में तीन सदस्य हैं। सऊदी में प्रत्येक माह 25 हजार रुपये मिलते थे। यहां आने के बाद सोच रहा था क्या करूं। दोस्तों ने सलाह दी गांव में चाय की दुकान खोल लो। शुरुआत में झिझक हुई, लेकिन परिजनों एवं दोस्तों ने उत्साह बढ़ाया तो रकम एकत्र कर चाय की दुकान खोल ली। अब दुकान अच्छी चल रही है। एक दिन में करीब एक हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। उन्होंने बताया कि दुकान खोली तो कुछ लोग उपहास करते थे, आज वही प्रशंसा कर रहे हैं। क्योंकि कोई भी काम छोटा नहीं होता।
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सौंदर्य प्रसाधन की दुकान में सेराज हुसैन।
- फोटो : अमर उजाला।
डगरुपुर गांव के ही सेराज हुसैन के परिवार में चार सदस्य हैं। वह दिल्ली में एक बाइक कंपनी में पार्ट बनाते थे। हर महीने आठ घंटे की ड्यूटी और चार घंटे ओवरटाइम करने पर 13 हजार रुपये की आमदनी होती थी। लॉकडाउन में काम बंद हुआ तो घर आ गए। इसके बाद दिल्ली नहीं गए। उन्होंने बताया कि डगरुपुर बाजार में अपनी जमीन में मकान बनवाकर सौंदर्य प्रसाधन की दुकान खोली। वर्तमान में 20 हजार की आमदनी हो जाती है। शुरुआत में दुकान चलाने में कुछ समस्या हुई, लेकिन अब नहीं है।
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मोबाइल फोन रिपेयरिंग की दुकान में सुनील कुमार।
- फोटो : अमर उजाला।
खैरहवां गांव के सुनील कुमार कोरोना काल से पहले दिल्ली में मोबाइल फोन की कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन में काम छूटा तो हार नहीं मानी। घर पर इतनी रकम नहीं थी की बड़ी दुकान खोल सके। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में छह सदस्य हैं। दिल्ली में हर माह 10 हजार रुपये मिलते थे। घर आने के बाद डगरुपुर में एक गुमटी में मोबाइल फोन रिपेयरिंग, गाना डाउनलोडिंग की दुकान खोली। अब रोज पांच सौ से अधिक की आमदनी हो जाती है। उनका कहना है अब बाहर जाने की जरूरत नहीं है। कोरोना काल में बहुत कुछ सीखने को मिला। इस आपदा ने मुश्किलों से जूझना सीखा दिया।