लॉकडाउन के 54 दिनों में शहर का कुछ ऐसा रहा हाल, ठहरे, चले अब दौड़ने की उम्मीद
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देश में कोरोना की दस्तक के साथ ही शुरू हुए लॉकडाउन के पहले चरण के 21 दिन तक जिंदगी ठप सी हो गई थी। स्कूल, दफ्तर, मॉल, बाजार, पार्क, सड़कें सब सूने पड़ गए। कोरोना से बचाव में लगे सरकारी तंत्र और कुछ निरंकुश लोगों को छोड़ दें तो कोई घर की दहलीज तक नहीं लांघ सका।
लॉकडाउन के दूसरे चरण (19 दिन) में सरकारी दफ्तर खुल गए। विकास परियोजनाएं शुरू हुईं तो आम आदमी की उम्मीदें भी जगीं। तीसरे चरण (14 दिन) में आम आदमी के लिए कई जरूरी सेवाओं से जुड़ी छूट मिली तो जिंदगी थोड़ी सामान्य होने लगी। निराशा टूटी। उम्मीदें जगीं। लोग सड़कों पर निकले। उद्योग-धंधे, कल-कारखानों की चिमनियों से कई दिन बाद धुआं निकला।
सरकार के साथ ही लोग भी अब यह मान चुके हैं कि जीवनशैली में बदलाव लाना जरूरी है, ताकि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के बजाए कोरोना संकट के बीच ही जिंदगी को रफ्तार दी जा सके।
प्रशासनिक मशीनरी की ठोस रणनीति ने लॉकडाउन के बीच तमाम तरह की दुश्वारियों का सामना कर रहे लोगों को राहत दी। सब्जी, दूध या फिर राशन सामग्री। हर सुविधा लोगों के घरों की दहलीज तक पहुंची। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट गौरव सिंह सोगरवाल की पहल पर जिले में शुरू हुए ऑनलाइन होम डिलीवरी पोर्टल दूसरे जिलों के लिए भी नजीर बने। पीएमओ और उप्र शासन ने भी ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के इस प्रयास को सराहा।