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Kharmas 2020: जानिए क्या है खरमास और क्यों नहीं होते इस माह में मांगलिक कार्य
Sun, 13 Dec 2020 04:54 PM IST
vivek shukla
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sun, 13 Dec 2020 04:54 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
खरमास की शुरुआत 15 दिसंबर से हो रही है। खरमास का समापन 14 जनवरी को मकर संक्रांति के साथ होगी। इस बीच एक माह तक किसी भी तरह के मांगलिक कार्य नहीं होंगे। राजधानी पंचांग के अनुसार सूर्य 15 दिसंबर, दिन मंगलवार को रात्रि मे 9 बजकर 32 मिनट पर धनु राशि मे प्रवेश कर रहे हैं और यह 14 जनवरी तक इसी राशि पर स्थित रहेंगे।
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय।
- फोटो : अमर उजाला
क्या है खरमास
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार सूर्य जब धुन राशि में पहुंचता है तो धनु की संक्रांति लगती है। इसी दिन से खरमास प्रारंभ हो जाता है और मकर की संक्रांति लगते ही खरमास समाप्त हो जाता है। यह लगभग एक माह का होता है। इसमें कोई भी शुभ कार्य न करें। खरमास को प्रारंभ हुए जब पंद्रह दिन व्यतीत हो जाए तब एक दिन तेल के पकौड़े बनाकर चील और कौवों को खिला दें। इस मास में भगवत् पूजन का विशेष महत्व है। अनेकों मंदिरों मे धनुर्मास का उत्सव मनाया जाता है। इस महीने में दही-भात और दूध से निर्मित पकवान (खीर आदि) के भोग का विशेष महत्व है। निष्काम भाव से धर्मशास्त्र के पुस्तक का वाचन, स्तोत्र पाठ आदि धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करने की अनुज्ञा है। केवल फल को दृष्टि में रखकर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान न किए जाएं।
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार सूर्य जब धुन राशि में पहुंचता है तो धनु की संक्रांति लगती है। इसी दिन से खरमास प्रारंभ हो जाता है और मकर की संक्रांति लगते ही खरमास समाप्त हो जाता है। यह लगभग एक माह का होता है। इसमें कोई भी शुभ कार्य न करें। खरमास को प्रारंभ हुए जब पंद्रह दिन व्यतीत हो जाए तब एक दिन तेल के पकौड़े बनाकर चील और कौवों को खिला दें। इस मास में भगवत् पूजन का विशेष महत्व है। अनेकों मंदिरों मे धनुर्मास का उत्सव मनाया जाता है। इस महीने में दही-भात और दूध से निर्मित पकवान (खीर आदि) के भोग का विशेष महत्व है। निष्काम भाव से धर्मशास्त्र के पुस्तक का वाचन, स्तोत्र पाठ आदि धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करने की अनुज्ञा है। केवल फल को दृष्टि में रखकर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान न किए जाएं।
ज्योतिष पं. शरद चंद्र मिश्र।
- फोटो : अमर उजाला
इस लिए नहीं होते मांगलिक कार्य
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार वर्ष में सूर्य की 12 संक्रांतियां होती है। इन बारह राशियों पर सूर्य की स्थिति रहती है। प्रत्येक एक मास तक एक राशि पर रहने के बाद सूर्य दूसरे राशि में प्रवेश करता है। इसमे दो संक्रांतियों पर सूर्य बृहस्पति की राशि पर रहता है। ये है धनु और मीन राशियां। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब सूर्य की स्थिति बृहस्पति की राशि पर होती है तो बृहस्पति का तेज समाप्त हो जाता है। मांगलिक कार्यों के लिए तीन ग्रहों के बल की आवश्यकता है। ये हैं सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति। इनमें किसी भी ग्रह के बल में न्यूनता होने से मांगलिक कार्य अवरूद्ध हो जाते हैं। खरमास के महीने में बृहस्पति के बलहीन होने से समस्त शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। इसी प्रकार जब महीने मे सूर्य चंद्रमा के अत्यन्त सन्निकट आ जाता है तो उस समय भी शुभ मुहूर्त का अभाव रहता है। यह स्थिति प्रत्येक महीने मे अमावस्या के आसपास देखा जाता है। इसे मासान्त दोष की संज्ञा से विभूषित किया गया है।
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार वर्ष में सूर्य की 12 संक्रांतियां होती है। इन बारह राशियों पर सूर्य की स्थिति रहती है। प्रत्येक एक मास तक एक राशि पर रहने के बाद सूर्य दूसरे राशि में प्रवेश करता है। इसमे दो संक्रांतियों पर सूर्य बृहस्पति की राशि पर रहता है। ये है धनु और मीन राशियां। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब सूर्य की स्थिति बृहस्पति की राशि पर होती है तो बृहस्पति का तेज समाप्त हो जाता है। मांगलिक कार्यों के लिए तीन ग्रहों के बल की आवश्यकता है। ये हैं सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति। इनमें किसी भी ग्रह के बल में न्यूनता होने से मांगलिक कार्य अवरूद्ध हो जाते हैं। खरमास के महीने में बृहस्पति के बलहीन होने से समस्त शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। इसी प्रकार जब महीने मे सूर्य चंद्रमा के अत्यन्त सन्निकट आ जाता है तो उस समय भी शुभ मुहूर्त का अभाव रहता है। यह स्थिति प्रत्येक महीने मे अमावस्या के आसपास देखा जाता है। इसे मासान्त दोष की संज्ञा से विभूषित किया गया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
खरमास में न करें ये कार्य
पंडित अरविंद गिरि के अनुसार वधू प्रवेश, वरवरण, कन्यावरण, बरच्छा, विवाह से संबंधित समस्त कार्य, मुंडन, यज्ञोपवीत, दीक्षाग्रहण, गृहप्रवेश, गृहारंभ, कर्णवेध, प्रथम बार तीर्थ पर गमन, देव स्थापन, देवालय का आरंभ, मूर्ति स्थापन, किसी विशिष्ट यज्ञ का आरंभ, कामना परक कर्म का आरंभ, व्रतारंभ, व्रत का उद्यापन आदि कार्य खरमास मे नहीं किए जाते हैं।
पंडित अरविंद गिरि के अनुसार वधू प्रवेश, वरवरण, कन्यावरण, बरच्छा, विवाह से संबंधित समस्त कार्य, मुंडन, यज्ञोपवीत, दीक्षाग्रहण, गृहप्रवेश, गृहारंभ, कर्णवेध, प्रथम बार तीर्थ पर गमन, देव स्थापन, देवालय का आरंभ, मूर्ति स्थापन, किसी विशिष्ट यज्ञ का आरंभ, कामना परक कर्म का आरंभ, व्रतारंभ, व्रत का उद्यापन आदि कार्य खरमास मे नहीं किए जाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला।
खरमास में भगवान सूर्य एवं श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना
पंडित अवधेश मिश्रा के अनुसार खरमास मे सूर्य की गति मंद पड़ने लगती है। इसलिए इस मास मे सूर्यदेव और श्रीकृष्ण की उपासना से विशेष लाभ प्राप्त होता है। खरमास मे पवित्र नदियों मे स्नान से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। इस मास मे पड़ने वाली एकादशी व्रत करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त नवमी तिथि को कन्याओं को भोजन कराकर उपहार देने से भी बाधाएं दूर होती हैं।
पंडित अवधेश मिश्रा के अनुसार खरमास मे सूर्य की गति मंद पड़ने लगती है। इसलिए इस मास मे सूर्यदेव और श्रीकृष्ण की उपासना से विशेष लाभ प्राप्त होता है। खरमास मे पवित्र नदियों मे स्नान से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। इस मास मे पड़ने वाली एकादशी व्रत करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त नवमी तिथि को कन्याओं को भोजन कराकर उपहार देने से भी बाधाएं दूर होती हैं।