आज हम आपको भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व काकोरी कांड के महानायक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की कहानी बताने जा रहे हैं। उन्होंने 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में जन्म लिया था। वहीं गोरखपुर में बिस्मिल की एक अलग पहचान है। अपने जीवन के आखिरी चार महीने और दस दिन उन्होंने यहां की जिला जेल में बिताए थे। यह वक्त उनके आध्यात्मिक सफर का भी अंतिम पड़ाव था।
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पढ़िए कहानी उस क्रांतिकारी की, जिसने हथियारों के लिए बेच दी थी अपनी लिखी किताब
Wed, 18 Nov 2020 08:35 AM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Wed, 18 Nov 2020 08:35 AM IST
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इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से संरक्षित किया गया है।
- फोटो : अमर उजाला
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राम प्रसाद बिस्मिल को इसी जगह दी गई थी फांसी।
- फोटो : अमर उजाला
बिस्मिल बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कुल 11 पुस्तकें लिखी थीं। वे इन पुस्तकों को स्टॉल लगाकर खुद भी बेचते थे। उनकी पुस्तकों में स्वाधीनता का अंश होता था। यही कारण है कि उनकी पुस्तकों को लोग ज्यादा पसंद करते थे। बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि उन्होंने क्रांतिकारी बनने के बाद पहला तमंचा अपनी किताब की बिक्री से मिली राशि से ही खरीदा था।
राम प्रसाद बिस्मिल अंतिम दिनों में इसी जगह पर बंदी रहे।
- फोटो : अमर उजाला
बिस्मिल के जीवन को नई पीढ़ी तक ले जाने की कोशिशों में जुटे गुरुकृपा संस्थान के बृजेश त्रिपाठी कहते हैं, बिस्मिल एक रचनाकार, कवि और साहित्यकार भी थे। वे अपने जीवन में गुरु भाई परमानंद और दादी मां के स्वाभिमान से बहुत प्रेरित थे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है। बृजेश कहते हैं, उनकी भावनाओं में देशभक्ति कूट-कूटकर भरी थी। वे बहुत पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन साहित्य के मर्मज्ञ थे।
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इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से संरक्षित किया गया है।
- फोटो : अमर उजाला
कोठरी संख्या सात में रहते थे बिस्मिल
बिस्मिल को छह अप्रैल 1927 को काकोरी कांड का अभियुक्त मानते हुए सजा सुनाई गई। वे पहले लखनऊ जेल में रखे गए। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने 10 अगस्त को 1927 को गोरखपुर जेल भेज दिया। यहां वे कोठरी संख्या सात में रहते थे। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से जाना जाता है।
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राम प्रसाद बिस्मिल को इसी जगह दी गई थी फांसी।
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एकादशी के दिन जन्म और इसी दिन बलिदान
बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी।
बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी।