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पढ़िए गोरखपुर के उस 'खूंखार डॉन' की कहानी, जिसके नाम पर कांपता था यूपी-बिहार

Thu, 02 Jul 2020 08:47 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 02 Jul 2020 08:47 AM IST
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Famous Don shri prakash shukla special story in Gorakhpur
श्रीप्रकाश शुक्ला की फाइल फोटो (बंदूक की सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : अमर उजाला।

90 के दशक में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से यूपी बिहार के लोग थरथर कांपते थे। लोग इसे शार्प शूटर के नाम से जानते थे। 25-26 साल के इस डॉन से पुलिस के साथ अपराधी भी खौफ खाते थे। यह वह दौर था जब लोग देशी कट्टा से गुंडागर्दी करते थे, ऐसे समय में श्रीप्रकाश के पास एके-47 थी। बता दें कि इस डॉन को पकड़ने के लिए ही यूपी में एसटीएफ का गठन हुआ था।

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Sri prakash Shukla - फोटो : सोशल मीडिया।

बता दें कि श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के मामखोर गांव में हुआ था। उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे। 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला की बहन को देखकर किसी ने छेड़खानी कर दी थी, उसने उस शख्स को बीच बाजार गोली मार दी थी। 20 साल की उम्र में श्रीप्रकाश ने यह पहला अपराध किया था। बताया जाता है कि इस कांड के बाद वह बैंकॉक भाग गया, वहां से वापस देश में आने के बाद उसने मोकामा (बिहार) का रुख किया और सूबे के सूरजभान गैंग में शामिल हो गया।

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बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद। (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया।

आतंक का दूसरा नाम श्रीप्रकाश शुक्ला था। इस बात से अंदाजा आप लगा सकते हैं कि साल 1997 में लखनऊ में बाहुबली राजनेता वीरेंद्र शाही को उसने दिन दहाड़े मौत के घाट उतार दिया था। इसके बाद तो यूपी में श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक कायम हो गया। यही नहीं श्रीप्रकाश ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को उनके सुरक्षाकर्मियों के सामने ही गोलियों से भून दिया था। उसने इस घटना में एके-47 राइफल का प्रयोग कर सनसनी फैला दी थी।

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यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री व राजस्थान के गवर्नर कल्याण सिंह। - फोटो : amar ujala

इसके बाद 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को चुनकर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई। इस फोर्स का पहला टास्क श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा पकड़ना था। बताया जाता है कि श्रीप्रकाश उस समय सूबे के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी (ठेका) ले ली थी। यह सौदा 5 करोड़ में तय हुआ था। उस समय श्रीप्रकाश शुक्ला की एक प्रेमिका भी थी जो दिल्ली में रहती थी। श्रीप्रकाश उससे लगातार फोन पर बात करता था। एसटीएफ को इस बात की जानकारी मिल गई थी। वे मोबाइल सर्विलांस की मदद से श्रीप्रकाश के करीब आ गए थे।

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श्रीप्रकाश शुक्ला। (File Photo) - फोटो : सोशल मीडिया।

इस बीच 23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को सूचना मिली कि श्रीप्रकाश दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। जैसे उसकी कार इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, एसटीएफ ने उसे घेर लिया। श्रीप्रकाश शुक्ला को सरेंडर करने को कहा गया लेकिन वह नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश मारा गया। श्रीप्रकाश की मौत के बाद उसका खौफ भले ही खत्म हो गया था लेकिन जरायम की दुनिया में आज भी उसके नाम के चर्चे होते हैं।

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