गोरखपुर के डॉक्टर विनय राय ने कहा कि सावधानी और समय से उपचार ही कोरोना से मुक्ति का आधार है। ऐसा नहीं है कि इस बीमारी का इलाज नहीं है। अगर थोड़ी सतर्कता बरतें तो इस बीमारी से खुद भी बचा जा सकता है और अपने प्रियजनों को भी सुरक्षित रख सकते हैं।
डॉक्टर की सलाह: कोरोना की दूसरी लहर को कैसे किया जाए काबू, ये उपाय हो सकते हैं कारगर
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रचित हॉस्पिटल के डॉ. विनय राय ने इस बीमारी और इसके बचाव के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के दो फेज होते हैं। पहला वायरल फेज जो शुरुआती छह से सात दिनों तक होता है। इसमें कुछ लक्षण पाए जाते हैं, जैसे बुखार, जुकाम, गले में दर्द, खराश, शरीर में दर्द, सुगंध और स्वाद का महसूस न होना, पेट में दर्द और पेट का खराब होना आदि।
उन्होंने हिदायत दी कि इस फेज के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और दूसरे फेज के लिए सतर्क हो जाना चाहिए। दूसरा इन्फ्लेमेटरी फेज होता है जिसमें लक्षण की शुरुआत छठे या सातवें दिन से प्रारंभ होती है। कभी- कभी इसकी मियाद बीस दिनों तक रह सकती है। इस अवस्था में मरीज को शुरुआती लक्षण कई बार नहीं दिखते।
मरीज को लगता है कि वह ठीक हो गया है। इस अवस्था में अधिक सतर्क रहना चाहिए। क्योंकि इस दौरान शरीर में सांस का फूलना, ऑक्सीजन का कम होना, धमनियों में खून का थक्का बनना, न्यूमोनिया होने जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। यदि ध्यान न दिया गया तो मरीज की जान भी जा सकती है। ऐसे में तुरंत ही चिकित्सक से परामर्श लेकर इलाज शुरू किया जाए, तो जटिलताओं से बचा जा सकता है।
सावधानियां बरतने से होगा बचाव
- यदि बुखार शुरुआती दिनों में बहुत तेज हो रहा है तो दूसरे फेज में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए सतर्क रहें और चिकित्सक के परामर्श के अनुसार दिनचर्या बिताएं।
- बीमारी होने पर पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन करें जिससे शरीर में पानी की कमी न रहे।
- मरीज को पांचवें दिन के बाद ब्लड ऑक्सीजन मॉनिटर करने की आवश्यकता होती है। छह मिनट टहलने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा जांची जानी चाहिए। तब ऑक्सीमीटर शरीर में ऑक्सीजन की सही मात्रा बताता है।
- छठवें या सातवें दिन मरीज को खून की जांच जैसे सीबीसी, सीआरपी, डी डायमर, आईएल-6 और सीने का सीटी स्कैन कराना चाहिए। इसमें फेफड़े का न्यूमोनिया और साइटोकाइन स्टार्म के बारे में जानकारी मिलती है। अधिक सीआरपी वैल्यू फेफ ड़े के नुकसान को इंगित करती है। ऐसे में किसी प्रशिक्षित चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। यदि छह से आठ दिन के पहले ही एंटी वायरल दवाएं चलाई जाती हैं तो यह वायरस लोड को कम करता है जिससे रोगी गंभीर हालत में नहीं पहुंचता। स्टेरॉयड जैसे मेडरॉल, डेक्सोना को शुरुआती छह से सात दिन में लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इस समय यह वायरस के बहुगुणन (मल्टीप्लीकेशन) को बढ़ावा देकर फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है।