उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पोस्टमार्टम हाउस में 40 हजार लोगों की मौत का राज बोतलों (शीशी) में कैद है। साल दर साल इसमें 50-100 बोतल विसरा की वृद्धि हो जाती है। इन हजारों बोतल विसरा में ज्यादातर अब किसी काम के नहीं हैं। यूं कह लें कि मौत का राज अब इन बोतलों में ही दफन हो गया है। फिर भी इन्हें सुरक्षित रखा गया है कि क्या पता, कब किसकी मौत के राज की तफ्तीश में इनकी जरूरत पड़ जाए।
Exclusive: यहां बोतलों में बंद हैं 40 हजार मौतों का राज, जानिए क्यों रखा गया है सुरक्षित
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
29 दिसंबर को कोतवाली इलाके के अलीनगर में व्यापारी दीपक कसौधन की मौत हो गई थी। पुलिस को आशंका हुई कि ठंड से मौत हुई है। पोस्टमार्टम के बाद विसरा सुरक्षित रखा गया है। इसी तरह 30 दिसंबर को गुलरिहा इलाके में सेवानिवृत्त रेलकर्मी जीतन की हत्या करने के मामले में भी विसरा जांच के लिए सुरक्षित रखा गया। इस तरह विसरा रखने की जानकारी पर अमर उजाला ने पड़ताल की कि आखिर इस सुरक्षित रखे गए विसरा का कुछ होता है भी क्या? इस पर चौंकाने वाली कहानी सामने आई।
दरअसल, जिन मामलों में मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता, उसमें पोस्टमार्टम के दौरान विसरा सुरक्षित रख लिया जाता है। इसकी हिस्टोपैथोलॉजिकल जांच से संबंधित की मौत की वजह समझने में मदद मिलती है। जानकारी के मुताबिक, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पोस्टमार्टम हाउस में पांच कमरों में विसरा रखे गए हैं।
वर्ष 1979 से रखे जा रहे विसरा सैंपल
पोस्टमार्टम हाउस के पास पांच कमरों में जमा विसरा सैंपल की संख्या 40 हजार पार कर चुकी है। वर्ष 1979 से ही यहां विसरा रखा जा रहा है। हर सैंपल को इस उम्मीद के साथ रखा जाता है कि आवश्यकता होगी तो उसे जांच के लिए भेजा जाएगा। मगर गिने-चुने को ही जांच के लिए भेजा जाता है। पुराने विसरा नमूनों को बेकार मान कर डिस्पोजल भी नहीं किया जा रहा है। नतीजा, यह है कि विसरा सैंपल के ढेर लग गए हैं।
नष्ट करने का है आदेश
छह साल पहले कमिश्नर रहे के. रवींद्र नायक ने पोस्टमार्टम हाउस का निरीक्षण किया था। तब उन्होंने उन सभी मामलों के सैंपल्स को नष्ट करने का आदेश दिया, जिनमें क्लोजर रिपोर्ट फाइल हो चुकी है। मगर, यहां भी आदेश का पालन इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि ये लेखा-जोखा मिला ही नहीं कि किस मौत के केस में फाइल बंद हो चुकी है। ऐसे में कमिश्नर का आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।
हो सकता है विवाद
विसरा मामले में खास यह भी है कि इसे एकत्र करने और संरक्षित रखने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के पास है। जबकि, इसकी जांच रिपोर्ट की जरूरत पुलिस विभाग को पड़ती है। मेडिकल डिपार्टमेंट इसलिए विसरा को नष्ट नहीं करता, क्योंकि कल को पुलिस विभाग या कोर्ट में कहीं मामला फंस न जाए। पुलिस विभाग यह बताने की जहमत नहीं उठाता कि किस केस में अब विसरा को सुरक्षित रखने की जरूरत नहीं।
जरूरत पर ही जांच
साल दर साल भले ही विसरा नमूनों की संख्या बढ़ रही है, मगर शायद ही किसी सैंपल को कभी उच्चस्तरीय प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया हो। रूटीन में विसरा को जांच के लिए नहीं भेजा जाता, मगर जहां कोर्ट केस में आर्डर होता है, उन्हीं सैंपल्स को जांच के लिए भेजने का प्रावधान है। मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि विसरा को सुरक्षित रखने के कई नियम कानून हैं, लेकिन उनका पालन नहीं होता है।
यह होता है विसरा
मेडिकल टर्म में विसरा पोस्टमार्टम के दौरान एकत्र किए जाने वाले बायो सैंपल को कहते हैं। सरल शब्दों में कहा जाए तो फेफड़ा, किडनी, आंत, हृदय, मस्तिष्क जैसे मानव शरीर के अंदरूनी अंगों के नमूनों के संकलन को विसरा कहते हैं। नियमानुसार पुलिस विवेचना के दौरान मौत की वजह की जांच के लिए विसरा नमूने को प्रयोगशाला भेजना चाहिए, मगर ऐसा नहीं हो पाता। जिस वजह से यह पोस्टमार्टम हाउस में बंद पड़े हैं।
सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय ने कहा कि मामले की जानकारी नहीं है। अगर ऐसा है तो इसको दिखवा कर जल्द से जल्द जांच कराई जाएगी। जांच कराने के लिए पत्र लिखा जाएगा।