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गोरखपुर के डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से कांपता था पूरा पूर्वांचल, इस बंदूक के दमपर मचाया था आतंक

Wed, 30 Dec 2020 03:07 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 30 Dec 2020 03:07 PM IST
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Gorakhpur Famous Don shri prakash shukla encounter story
श्रीप्रकाश शुक्ला। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।

यूपी और बिहार में 90 के दशक में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से लोग कांपते थे। उस समय लोग इसे मौत का सौदागार बुलाते थे। 25-26 साल के इस डॉन से पुलिस के साथ बड़े-बड़े अपराधी भी खौफ खाते थे। यह वह दौर था जब लोग देशी कट्टा से गुंडागर्दी करते थे, ऐसे समय में श्रीप्रकाश के पास एके-47 थी। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें इसके आंतक की कहानी...




 

Gorakhpur Famous Don shri prakash shukla encounter story
श्रीप्रकाश शुक्ला। (File Photo) - फोटो : सोशल मीडिया।
गौरतलब है कि श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के मामखोर गांव में हुआ था। उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे। बताया जाता है कि 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला की बहन को देखकर किसी ने छेड़खानी कर दी थी, इस बात से नाराज होकर इसने उस शख्स को बीच बाजार गोली मार दी थी। 20 साल की उम्र में श्रीप्रकाश ने यह पहला अपराध किया था।
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बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद। (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया।

इस कांड के बाद श्रीप्रकाश बैंकॉक भाग गया था, वहां से वापस आने के बाद उसने मोकामा (बिहार) का रुख किया और सूबे के सूरजभान गैंग में शामिल हो गया था। इसके आतंक का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि साल 1997 में लखनऊ में बाहुबली राजनेता वीरेंद्र शाही को उसने दिनदहाड़े मौत के घाट उतार दिया था। यही नहीं श्रीप्रकाश ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को उनके सुरक्षाकर्मियों के सामने ही गोलियों से भून दिया था। उसने इस घटना में उसने एके-47 राइफल का प्रयोग कर सनसनी फैला दी थी।


 

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एसटीएफ - फोटो : सोशल मीडिया
इसके बाद 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को चुनकर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई। इस फोर्स का पहला टास्क श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा पकड़ना था। बताया जाता है कि श्रीप्रकाश उस समय सूबे के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी (ठेका) ले ली थी। यह सौदा 5 करोड़ में तय हुआ था। उस समय श्रीप्रकाश शुक्ला की एक प्रेमिका भी थी जो दिल्ली में रहती थी। श्रीप्रकाश उससे लगातार फोन पर बात करता था। एसटीएफ को इस बात की जानकारी मिल गई थी। वे मोबाइल सर्विलांस की मदद से श्रीप्रकाश के करीब आ गए थे।

 
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Sri prakash Shukla (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया।
इस बीच 23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को सूचना मिली कि श्रीप्रकाश दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। जैसे उसकी कार इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, एसटीएफ ने उसे घेर लिया। श्रीप्रकाश शुक्ला को सरेंडर करने को कहा गया लेकिन वह नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश मारा गया। श्रीप्रकाश की मौत के बाद उसका खौफ भले ही खत्म हो गया था लेकिन जरायम की दुनिया में आज भी उसके नाम के चर्चे होते हैं।
 
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