पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब पर बनी फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर का ट्रेलर सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। जहां भाजपा इस बहाने गांधी परिवार पर तानाशाही का आरोप लगा रही है, वहीं इस किताब में किए गए दावों के जरिए कांग्रेस पर हमला तेज कर दिया है। चार वर्षों तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह' में सबसे नुकसान पहुंचाने वाला आरोप ये लगाया है कि मनमोहन सिंह अपने ही कार्यालय के मालिक नहीं थे और कांग्रेस नेतृत्व के प्रभावशाली लोग लगातार उनकी उपेक्षा करते थे। आइए नजर डालते हैं उन पांच अफसरों पर जिन्होंने खड़ी की मनमोहन सिंह सरकार के लिए मुसीबत...
द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के लिए मुसीबत बने थे उनके ये 5 अफसर, खोले थे ये राज
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संजय बारू
बारू लिखते हैं, "2009 की जबरदस्त जीत के बाद भी मनमोहन सिंह की रीढ़विहीनता समझ के परे थी। अगर वो अपने ही दफ्तर में अपनी पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति करवा पाने में अक्षम थे तो इसका मतलब ये था कि उन्होंने बहुत जल्दी ही 'दूसरों' को जगह दे दी थी।" इस किताब के मुताबिक, "सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सुपर कैबिनेट की तरह काम करती थी और सभी सामाजिक सुधारों के कार्यक्रमों की पहल करने का श्रेय उसे ही दिया जाता था।" बारू लिखते हैं, "मनमोहन सिंह की अवहेलना करने का ये आलम था कि अमरीका जैसे देश की यात्रा कर वापस आने के बाद विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस बात की ज़रूरत भी नहीं समझी थी कि वो इस बारे में मनमोहन सिंह को ब्रीफ करें।" इस किताब ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कांग्रेस पर हमला करने का एक और हथियार दे दिया। जब यह किताब आई थी तब भाजपा का कहना था कि अगर प्रधानमंत्री खुद सशक्त नहीं है तो वो लोगों को सशक्त कैसे बना सकता है। वैंकैया नायडू ने कहा था कि ये चीज तो मैं पहले दिन से कहता आ रहा हूं जो बारू आज कह रहे है, "पीएम प्रेसाइड्स बट मैडम डिसाइड्स।"
पीसी परख
संजय बारू की किताब के प्रकाशित होने के कुछ दिनों के अंदर ही पूर्व कोयला सचिव पी सी परख की किताब आई, ‘क्रुसेडर ऑर कॉन्सपिरेटर? कोलगेट एंड अदर ट्रूथ्स’ जिसमें उन्होंने मनमोहन सिंह की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए थे। परख कहते हैं, "मनमोहन सिंह एक ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे जिसमें उनके पास बहुत कम राजनीतिक ताकत थी।"
परख का मानना है कि अगर मनमोहन सिंह ने सुधारों को लागू करने और कोयला ब्लॉकों के आवंटन की खुली नीलामी का समर्थन किया होता तो 1.86 लाख करोड़ के कोयला घोटाले से बचा जा सकता था। परख 2005 में रिटायर हो गए थे और उनके खिलाफ सीबीआई ने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में एक मामला दायर किया है। वह कहते हैं कि मनमोहन सिंह के जूनियर मंत्रियों ने कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में और पारदर्शिता लाने के प्रयासों का पूरी ताकत से विरोध किया लेकिन तब भी प्रधानमंत्री चुप रहे। परख लिखते हैं कि जब भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान ने संसदीय समिति की बैठक में उनका अपमान किया तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला कर लिया। जब वो 17 अगस्त 2005 को प्रधानमंत्री से मिलने गए और उन्हें अपना इस्तीफा देने का कारण बताया तो मनमोहन सिंह बोले, "मुझे भी रोज़ इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर मैं इन मुद्दों पर रोज-रोज इस्तीफा देने लगा तो इससे देश का कोई हित नहीं होगा।" परख कहते हैं, "एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करने की वजह से जिसमें उनकी कोई राजनीतिक ताकत नहीं थी, मनमोहन सिंह की छवि को गहरा धक्का लगा है, हांलाकि उनकी निजी ईमानदारी का रिकॉर्ड पूरी तरह से दागरहित रहा है।"
आर के सिंह
पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने भी कहा था कि मनमोहन सरकार को शासन करने का कोई सलीका नहीं है और वो एक 'भ्रष्ट' सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। आरके सिंह का मानना था कि मनमोहन सरकार ने इटली के नौसेनिक मामले में उनके साथ जरूरत से ज्यादा उदारता बरती है। उन्होंने कोयला मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि घोटाले की पूरी जानकारी होते हुए भी उन्होंने उसको रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए। ये वही आरके सिंह हैं जिन्होंने 1990 में समस्तीपुर के जिलाधिकारी के रूप में आडवाणी की रथ यात्रा रोकी थी और उन्हें गिरफ्तार किया था।
विनोद राय
पूर्व कंट्रोलर एंड ऑडीटर जनरल (सीएजी) विनोद राय ने मनमोहन सरकार को सार्वजनिक धन के गलत इस्तेमाल के लिए लगातार कठघरे में खड़ा किया। कोयला घोटाले के बारे में उनका कहना था कि इसकी वजह से देश को 1.86 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ और इसके लिए उन्होंने मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया क्योंकि उस समय कोयला मंत्रालय उनके नियंत्रण में था। आरोप लगे कि कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने मामले की जांच कर रही सीबीआई की रिपोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश की और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणी के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा जिससे मनमोहन सिंह की काफी किरकिरी हुई। सीएजी के दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के घोटालों और आदर्श सोसाएटी घोटाले की रिपोर्ट पेश किए जाने के बाद भी मनमोहन सरकार की काफी बदनामी हुई।