{"_id":"5e7590248ebc3e6ff06bbe60","slug":"nirbhaya-case-delhi-latest-news-former-aiims-director-dr-mc-mishra-told-painful-moment-for-first-time","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"Nirbhaya Case: इतनी पीड़ा के बाद भी मुस्कुरा कर जवाब देती थी निर्भया, डॉक्टर बोले-पानी भी नहीं दे सके","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Nirbhaya Case: इतनी पीड़ा के बाद भी मुस्कुरा कर जवाब देती थी निर्भया, डॉक्टर बोले-पानी भी नहीं दे सके
Sat, 21 Mar 2020 09:25 AM IST
शाहरुख खान
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 21 Mar 2020 09:25 AM IST
विज्ञापन
nirbhaya case
- फोटो : अमर उजाला/सोशल मीडिया
सफदरजंग अस्पताल का आईसीयू, एक बड़ा बिस्तर और सिराना ऊपर करके लेटी निर्भया। मशीनों से घिरा उसका बिस्तर और दोनों छोर पर डटे थे डॉक्टर। मशीनों से आती टू...टू...की आवाजें कभी कमरे में पसरे सन्नाटे का एहसास करातीं, तो कभी निर्भया की चीखें उसकी बर्बरता का। चीखों को सुन अच्छा खासा इंसान तक हिल जाता, फिर डॉक्टर क्या चीज थे? हुआ भी यही। निर्भया की पीड़ा ऐसी थी कि सफदरजंग की डॉक्टर सहन न कर सकीं और बाहर दौड़ गईं। अस्पताल के बाहर मीडिया का जमावड़ा था और आईसीयू के बाहर निर्भया की मां के करुण स्वर। ये दिन था सोमवार, तारीख 17 दिसंबर 2012 और वक्त शाम 6.30 बजे के आसपास।
डॉ. एमसी मिश्रा
- फोटो : Social Media
निर्भया के अंतिम 10 दिन की ये बातें एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिश्रा ने सुनाईं, जिन्हें 17 से 26 दिसंबर, 2012 तक का एक-एक मिनट अब भी याद है। उन्होंने बताया कि इतने दर्द के बाद भी वह जीना चाहती थी। अपने आंखों के सामने दरिंदों को सजा दिलाना चाहती थी। जीने के प्रति उसकी इच्छाशक्ति जबरदस्त थी। वह अपनी पीड़ा के बाद भी मुस्कुरा कर जवाब देती थी, मैं उस बच्ची के जज्बे को सलाम करता हूं। सात साल में पहली बार डॉ. मिश्रा ने निर्भया को सिंगापुर भेजे जाने के पीछे बड़ी वजह स्मॉल बॉल ट्रांसप्लांट बताया, जिसका भारत में कोई सेंटर ही नहीं था।
nirbhaya case
- फोटो : शुभम बंसल
उस समय डॉ. मिश्रा दिल्ली एम्स के ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख हुआ करते थे। एक विशेषज्ञ होने के चलते वे निर्भया के इलाज पर विशेष निगरानी के लिए तैनात किए थे। उन्होंने बताया कि दांतों से उसके चेहरे पर काटने के निशान, तो छाती और गला नाखून से जख्मी थे। पेट पर नुकीली धातु की चोट और शरीर के अंदर छोटी आंत डेमेज थी। संक्रमण ज्यादा था, इसलिए 15 इंच लंबी छोटी आंत को निकालना पड़ गया। बड़ी आंत का करीब करीब आधा भाग डेमेज था। फिर भी वह डटी थी, जिंदगी जीने के लिए...। निर्भया के शरीर में आंत नहीं थी। संक्रमण भी बहुत था। किडनी और लिवर की कार्यशैली ठीक थी लेकिन भारत में तब आंत का प्रत्यारोपण करने के लिए कोई सेंटर ही नहीं था, इसलिए निर्भया को सिंगापुर में स्मॉल बॉल ट्रांसप्लांट के लिए भेजा था।
विज्ञापन
विज्ञापन
निर्भया
- फोटो : self
26 दिसंबर, 2012 को बुधवार था और तब निर्भया को सिंगापुर ले जाने के लिए पांच डॉक्टरों को मेदांता अस्पताल की एंबुलेंस में एयरपोर्ट तक भेजा, उस वक्त बुखार 103 था और प्लेटलेट्स करीब 80 हजार, डब्ल्यूबीसी काउंट 5600 था। किडनी सही काम कर रही थी, इसलिए यूरीन की दिक्कत नहीं थी, लेकिन पीलिया 7.7 था, जोकि गंभीर था।
विज्ञापन
Nirbhaya case
- फोटो : अमर उजाला
जीवट थी निर्भया...पानी भी नहीं दे सके
निर्भया जीवट थी। 24 दिसंबर की दोपहर 2 बजे से उसकी तबीयत बिगड़ने लगी थी। उसे पानी देना भी बंद कर दिया था। वह प्यासी थी, लेकिन हमारे पास चम्मच से एक या दो बूंद देने के अलावा कोई विकल्प न था। उसके शरीर में अंदर ही अंदर रक्तस्त्राव हो रहा था, इसलिए कुछ भी नियंत्रण से बाहर था। ये कहना है सफदरजंग अस्पताल के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी का। वे कहते हैं कि ऑपरेशन से आंत के बाकी हिस्से को निकाला। ऑपरेशन के बाद वह आईसीयू में थी। इसके बाद अगले दो दिन वह ठीक थी, लेकिन धीरे-धीरे संक्रमण बढ़ने लगा था।
निर्भया जीवट थी। 24 दिसंबर की दोपहर 2 बजे से उसकी तबीयत बिगड़ने लगी थी। उसे पानी देना भी बंद कर दिया था। वह प्यासी थी, लेकिन हमारे पास चम्मच से एक या दो बूंद देने के अलावा कोई विकल्प न था। उसके शरीर में अंदर ही अंदर रक्तस्त्राव हो रहा था, इसलिए कुछ भी नियंत्रण से बाहर था। ये कहना है सफदरजंग अस्पताल के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी का। वे कहते हैं कि ऑपरेशन से आंत के बाकी हिस्से को निकाला। ऑपरेशन के बाद वह आईसीयू में थी। इसके बाद अगले दो दिन वह ठीक थी, लेकिन धीरे-धीरे संक्रमण बढ़ने लगा था।