21 अगस्त 2013 को भाई के साथ हुए हादसे की सूचना आई। इसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा। यह बताते हुए गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में रहने वाले हरीश राणा के छोटे भाई आशीष भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि पहले ही दिन वह कोमा में चले गए, तब से लेकर आज तक कोई सुधार नहीं हुआ।
आशीष ने बताया कि बीच में एक महीने की प्राकृतिक थेरेपी भी कराई थी, जो देश के दो ही अस्पतालों में होती है। परिवार ने इसे दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में कराया था। इसमें ठीक होने की काफी उम्मीद होती है। 30 दिन की थेरेपी में अधिकतर अच्छे परिणाम आते हैं, लेकिन भाई के मामले में ऐसा नहीं हो सका। अशोक राणा की एक बेटी और दो बेटे हैं। इनमें हरीश सबसे बड़े हैं।
ऑफिस के साथ भाई का भी ध्यान रखा
आशीष बताते हैं कि हादसे के समय वह 12वीं कक्षा में थे, अब ग्रेजुएशन कर गुड़गांव की एक कंपनी में नौकरी कर रहे हैं। वह भाई का सारा काम करके ऑफिस जाते हैं। हर सुबह चार बजे से उनकी दिनचर्या शुरू होती है। इसमें भाई को उठाना, बैठाना, करवट दिलाना, मालिश करना और फीडिंग कराना शामिल है।
कहा कि सर्दियों में धूप में व्हीलचेयर पर बैठाते हैं, गर्मी में घर में घुमाते हैं। हर दो घंटे में दूध, दाल का पानी, पीसकर अंडा और भिगोई रोटी ट्यूब से देते हैं। सुबह ऑफिस के बाद मां-पापा ध्यान रखते हैं। यह दिनचर्या वर्षों से चल रही है, अब एम्स जाने के बाद सब बदल जाएगा। मां बहुत उदास हैं।
रिश्तेदारों का लगा है आना-जाना
हरीश को उच्चतम न्यायालय की ओर से इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी मिलने के बाद घर में रिश्तेदारों का आना जाना लगा है। आशीष कहते हैं कि कई परिजन और रिश्तेदार आए हुए हैं।
एफआईआर और जांच पर सवाल
आशीष ने हादसे के दौरान हरीश के हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने की बात पर सवाल उठाया। कहा, हमें लगता है किसी ने जानबूझकर धक्का दिया। हमने एफआईआर कराई, लेकिन जांच में बस बताया गया कि वो गिर गए। इस एंगल को गंभीरता से नहीं लिया गया।