एलएलबी के तृतीय वर्ष के छात्र सुशांत रोहिल्ला के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया था। संस्थान ने केवल नियमों का पालन किया था। छात्र की खुदकुशी दुखद है लेकिन इसके लिये संस्थान किसी तरह से जिम्मेदार नहीं है। यह दलील मंगलवार को हाईकोर्ट के समक्ष एमिटी लॉ स्कूल की ओर से दी गई।
जस्टिस सिद्घार्थ मृदुल व जस्टिस नजमी वजीरी के समक्ष एमिटी के लिये वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि सुशांत रोहिल्ला को हाजिरी पूरी न होने के कारण परीक्षा में बैठने का मौका नहीं मिला था। उसके लिये परीक्षा की अनुमति के लिये शिक्षा संस्थान ने आई पी यूनिवर्सिटी को पत्र भी लिखा था लेकिन नियम के चलते उसे अनुमति नहीं मिली थी।
शिक्षा संस्थान की ओर से बहस करते हुये सिब्बल ने कहा कि छात्र या उसके घरवालों ने कभी भी भेदभाव या किसी अध्यापक की दुर्भावना की शिकायत संस्थान से नहीं की थी। अगर ऐसी बात सामने आती है तो उसके समाधान की कोशिश की जाती। इसके लिये पूरा तंत्र संस्थान में मौजूद है।
अदालत ने इस तरह के मामलों में छात्रों की मदद के लिये तय किये उपायों से संबंधित दस्तावेज पेश करने का निर्देश शिक्षा संस्थान को दिया है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिये 12 सितंबर की तारीख तय की है।
एमिटी के तीसरे वर्ष के लॉ के छात्र सुशांत रोहिल्ला ने 10 अगस्त 2016 में खुदकुशी कर ली थी क्योंकि उसे कम उपस्थिति होने के कारण परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। उसने अपने सुसाइड नोट में खुद को नाकाम बताते हुये खुदकुशी कर ली थी।
कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुये 11 जुलाई को शिक्षा संस्थान को कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि हमारी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह अमानवीय हो गई है।