धर्मदंड लिए जूना अखाड़े के कोतवालों की देखरेख में गंगा किनारे अलकनंदा घाट पर दीक्षा संस्कार का आयोजन हुआ। इसमें एक हजार से अधिक नागा संन्यासियों को दीक्षा दी गई। नागा संन्यासी बनने से पहले खुद का पिंडदान किया।
नागा संन्यासियों का सबसे बड़ा अखाड़ा श्रीपंच दशनाम जूना अखाड़ा में सभी चारों मणियों (चार, सोलह, तेरह व चौदह) में दीक्षित होने वाले नागाओं का मुंडन संस्कार सोमवार सुबह आठ बजे से दु:खहरण हनुमान मंदिर के निकट स्थित धर्म ध्वजा मणियों के नीचे शुरू हुआ।
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मुंडन के बाद नागाओं ने अलकनंदा घाट पर गंगा स्नान किया गया। इसके बाद सांसरिक वस्त्रों का त्याग कर कोपीन दंड, कमंडल धारण कर स्नान किया। इस दौरान ब्राह्मण पंडितों द्वारा सभी नागाओं का स्नान के दौरान स्वयं का श्राद्धकर्म संपन्न कराया।
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जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय सचिव श्रीमहंत मोहन भारती ने बताया कि आवेदकों की बारीकी से जांच के बाद दीक्षा के लिए केवल योग्य एवं पात्र साधुओं का ही चयन किया जाता है।
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एक हजार संत बने नागा संन्यासी
- फोटो : अमर उजाला
नागा संन्यासी बनने के लिए कई कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इसके लिए सबसे पहले नागा संन्यासी को महापुरुष के रूप में दीक्षित कर अखाड़े में शामिल किया जाता है।
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एक हजार संत बने नागा संन्यासी
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तीन साल तक महापुरुष के रूप में दीक्षित संन्यासी को संन्यास के कड़े नियमों का पालन करते हुए गुरु सेवा के साथ-साथ अखाड़े में विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं। तीन साल की कठिन साधना में खरा उतरने के बाद कुंभ पर्व पर उन्हें नागा बनाया जाता है।
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एक हजार संत बने नागा संन्यासी
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सोमवार को दीक्षा प्रक्रिया आचार्य महामंडलेश्वर के दिशा निर्देश में चली। आधी रात के बाद विजया हवन संस्कार सहित पूरी रात ओम नम: शिवाय का जाप किया। नागा साधु बनने के दौरान होने वाले कर्म में लगातार 24 घंटे तक कठिन तप करना होता है।
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एक हजार संत बने नागा संन्यासी
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आचार्य महामंडलेश्वर ने बताया कि इस दौरान एक हजार से अधिक नागा संन्यासी बने। इस दौरान सभापति श्रीमहंत प्रेमगिरि, श्रीमहंत हरिगिरि, श्रीमहंत मोहन भारती, श्रीमहंत महेशपुरी, श्रीमहंत शैलेंद्र गिरि, श्रीमहंत गणपत गिरि, रतमा पंच के श्रीमहंत मौजूद रहे।