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महाकुंभ 2021: दंडी बाड़ा पहली बार करेगा शाही स्नान, साधु-संन्यासियों के सबसे पुराने स्वरूप के होंगे दर्शन 

Sun, 04 Apr 2021 07:56 PM IST
अलका त्यागी कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार
कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 04 Apr 2021 07:56 PM IST
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Haridwar Maha Kumbh 2021: DandiBada Saints will Do Shahi snsn for the first time
कुंभ मेले में शाही स्नान - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

साधु-संन्यासियों के सबसे पुराने स्वरूप का दर्शन करना हो तो इस बार हरिद्वार कुंभ में जरूर आएं। दंडी स्वामी पहली बार दशनाम संन्यासियों के अखाड़ों के साथ शाही स्नान करने हरकी पैड़ी जाएंगे।



मनु द्वारा स्थापित यह दंड परंपरा अखाड़ों में स्वयं आद्य शंकराचार्य ने प्रारंभ की थी। उन्होंने न केवल ढाई हजार वर्ष पूर्व स्वयं दंड धारण किया अपितु शंकराचार्यों की चार पीठों पर आसीन होने वाले अपने प्रतिनिधि शंकराचार्यों के लिए भी दंड अनिवार्य कर दिया। यह आश्चर्य की बात है इससे पहले कभी साधुओं के मूल स्वरूप दंडी बाड़े को शाही स्नानों में शामिल नहीं किया गया।

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संन्यासियों के दंड धारण की परंपरा का उल्लेख मनुस्मृति में है। वर्तमान में नागा संन्यासी अखाड़ों के तमाम साधु उसी परंपरा से आए हैं। चारों पीठों के शंकराचार्यों के लिए भी दंड धारण अनिवार्य है। कुंभ पर संन्यास दीक्षा के बाद दंड धारण कराया जाता है।

मनुस्मृति के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ अवस्था के बाद दंडी संन्यासी बना जा सकता है। दंडी साधु के लिए नियम है कि वह 12 वर्ष बाद दंड फेंक दें और परमहंस हो जाए। हरिद्वार में दंडी स्वामियों के निवास के लिए कई स्थायी दंडी बाड़े हैं। दंडी साधु के लिए पांच घर भिक्षा का नियम है।

Haridwar Maha Kumbh 2021: DandiBada Saints will Do Shahi snsn for the first time
कुंभ मेले में शाही स्नान - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

स्नान से दंडियों को जोड़ने का काम संन्यासियों का सबसे बड़ा जूना अखाड़ा प्रारंभ कर रहा है। किन्नर अखाड़े की तरह दंडी आश्रमों और बाड़ों के महात्मा उन्हें अपने साथ दोनों स्नान कराएंगे। महिला संतों का माईवाड़ा और नागाओं के कर्मकांड कराने वाला गूदड़ अखाड़ा भी जूना के साथ शाही स्नान करता आया है।

Haridwar Maha Kumbh 2021: DandiBada Saints will Do Shahi snsn for the first time
कुंभ मेले में शाही स्नान - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
वहीं आपको बता दें कि, कुंभ में पहले स्नान को लेकर संन्यासियों और बैरागियों के बीच ही नहीं, खुद संन्यासियों में भी क्रम को लेकर संघर्ष होता था। पहले स्नान का अधिकार किस अखाड़े के पास है, इसका समाधान न तो तत्कालीन राजा-महाराजा करा पाए और न ही अखाड़ों के बड़े संत। अखाड़ों में तब कोई नियम-कानून या विधान भी नहीं था। अंत में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अंग्रेजों ने संतों की सहमति से नियम बनवाए।
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कुंभ मेले में शाही स्नान - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

13 अखाड़ों के अब कुल सात स्नान हैं। संन्यासियों के तीन, बैरागियों के दो और उदासियों और निर्मलों के एक-एक स्नान हैं। झगड़ा पहले बने अखाड़ों को लेकर था। आदि शंकराचार्य ने सबसे पहले आह्वान अखाड़ा बनाया था। जूना अखाड़ा सबसे बाद में बना। यही कारण था कि पहले कौन को लेकर संन्यासियों के अखाड़ों में प्रत्येक कुंभ पर हिंसक संघर्ष होते थे।

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कुंभ मेले में शाही स्नान - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

अंत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने तीन स्नानक्रम बनाए। इनके अनुसार आह्वान, अग्नि और जूना को साथ-साथ समय दिया गया। निरंजनी और आनंद साथ जुड़े तथा महानिर्वाणी और अटल एक साथ। यह जुड़ाव अखाड़ों का है। प्रत्येक शाही स्नान पर संन्यासी अखाड़ों के क्रम बदल जाते हैं। चारों कुंभ नगरों में क्रम अलग-अलग हैं। यह तय है कि सातों संन्यासी अखाड़े बैरागी अणियों से पहले स्नान करेंगे।

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