सितंबर 1965 में सेना ने एक ऐसे ऑपरेशन ‘फौलाद’ को अंजाम दिया था, जिसने पाकिस्तानी सेना से लेकर हुक्मरानों तक को हिला कर रख दिया था। इस ऑपरेशन में एलओसी पार कर वेस्टर्न कमांड के अधीनस्थ दो सिख रेजिमेंट के जांबाजों ने पाकिस्तान के कब्जे से दो महत्वपूर्ण ‘राजा’ और ‘रानी’ पोस्ट को छीन लिया था। पहले डोगरा रेजिमेंट इसमें नाकाम रह चुकी थी। उसके बाद सिख रेजिमेंट ने यह टास्क खुद लिया और राजा और रानी पोस्ट को फतेह कर लिया हालांकि इसकी कीमत 41 जवानों की शहादत देकर चुकानी पड़ी।
पाक को दहला देने वाला ऑपरेशन, भारतीय सेना ने छीन लिया था 'राजा-रानी', पढ़ें गौरवगाथा
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सेना अब इस ‘ऑपरेशन फौलाद’ के पराक्रम से नई पीढ़ी को रूबरू करवाना चाहती है। इसकी शुरुआत सेना ने आर्मी मिलिट्री फेस्ट से शुरू की है। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दिल्ली इत्यादि इलाकों से आए स्कूल व कॉलेज छात्रों समेत अन्य लोगों ने इस फेस्ट में ‘नॉ अवर आर्मी’ के तहत इस ऑपरेशन की जानकारी हासिल कर सेना पर गर्व महसूस किया। इस ऑपरेशन को सेना आज ‘राजा लीत्ता, राजा दीत्ता’ के नाम से याद करती है। फौज कहती है कि पाकिस्तान से राजा लेने के लिए हमने लेफ्टिनेंट एनएन खन्ना के रूप में अपने राजा को भी खोया था।
हाजी पीर पास से घुसपैठ करवाता था पाकिस्तान
सन 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान एलओसी पार पाक अधिकृत कश्मीर से पीर पंजाल रेंज की ओर हाजी पीर पास (पुंछ के नजदीक) यह ऐसा क्षेत्र था, जहां से पाकिस्तान भारत में घुसपैठ करता था। भारत इसी घुसपैठ को रोकना चाहता था। इस क्षेत्र में पाकिस्तान की दो मजबूत चौकियां ‘राजा’ और ‘रानी’ तैनात थी। जहां पाक आर्मी की 1 कंपनी और रेंजर्स की 2 पलटून तैनात थी। इन चौकियों पर तैनात दुश्मन ऐसी पोजीशन में था कि ऊपर से होने वाली जबरदस्त गोलाबारी से वहां तक पहुंचना नामुमकिन था। पोस्ट की सुरक्षा के लिए दो मजबूत बंकर भी मौजूद थे।
डोगरा रेजिमेंट की असफलता के बाद बिग्रेड कमांडर ने विभिन्न कमांडिंग अफसरों की बैठक ली और इस मुश्किल टास्क पर चिंता जाहिर की। तभी बैठक में उपस्थित दो सिख रेजिमेंट के तत्कालीन कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल नरेंद्र नाथ (एनएन) खन्ना उठे और स्वेच्छा से इस टास्क की जिम्मेदारी ली। 19 अगस्त 1965 को रेजिमेंट पुंछ की ओर कूच कर गई, ऑपरेशन का नाम दिया गया ‘फौलाद’।
70 गज की जासूसी के बाद बदला था हमले का दिन
हमले से पहले रेजिमेंट के कैप्टन अनूप सिंह धरनी और हवलदार उजागर सिंह की रेकी टीम 3 सितंबर को एलओसी पार इन पाक चौकियों के 70 गज नजदीक तक पहुंच गई थी और वहां से सारी जानकारियां मालूमात कर 4 सितंबर को आधी रात ढाई बजे वापस लौटी। यही जानकारियां ऑपरेशन की सफलता में बड़ी मददगार बनी।
इस अहम जासूसी के तुरंत बाद ब्रिगेड हेडक्वार्टर ने मंथन कर हमले का दिन ही बदलकर छह सितंबर से पांच सितंबर कर दिया। तैयारियों को बीच में छोड़ सिख रेजिमेंट के जांबाज राजा पोस्ट की ओर कूच गए। भारी गोलीबारी, माइंस और तारबंदी के मद्देनजर पूर्वी दिशा से पहाड़ पर चढ़ाई शुरू की गई। मगर आखिरी 300 मीटर की चढ़ाई बिल्कुल सीधी व कठिन थी। ऊंचाई पर बैठे दुश्मन की एमएमजी का मुंह लगातार हमारे जवानों की ओर खुला हुआ था।