शहीद सुखदेव को शहीद भगत सिंह इतने अजीज थे कि वे उनके लिए एक बार फूट फूट कर रोए थे। शहीद सुखदेव के जन्मदिवस के मौके पर सुनिए वो किस्सा।
यह किस्सा तब का है जब इन क्रांतिकारियों ने रेवोल्यूशनरी पार्टी का गठन कर दिया था। भगत सिंह सांडर्स हत्याकांड को अंजाम दे चुके थे। अंग्रेज उन्हें तलाश रहे थे। पार्टी की एक बैठक में तय हुआ कि अब सेंट्रल एसेंबली में बम धमाका किया जाएगा। उस बैठक में सुखदेव मौजूद नहीं थे। फैसला हुआ कि इस काम के लिए भगत सिंह को नहीं भेजा जाएगा, क्योंकि पुलिस पहले ही सांडर्स हत्याकांड में उनकी तलाश कर रही है।
पार्टी नहीं चाहती थी कि भगत पुलिस के हाथ लग जाएं, लेकिन बाद में सुखदेव ने यह फैसला पलट दिया। उन्होंने कहा, इस काम के लिए भी उनके दोस्त भगत सिंह ही जाएंगे। भगत सिंह को भेजा गया और वे पकड़े गए। इतिहासकार बताते हैं कि भगत सिंह के गिरफ्तार होने के बाद सुखदेव बंद कमरे में बहुत रोए थे। उन्हें अफसोस था कि उन्होंने अपने सबसे प्यारे दोस्त को कुर्बान कर दिया।
शहीद सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907 को गोपरा, लुधियाना, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम रामलाल थापर था, जो अपने व्यवसाय के कारण लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद, पाकिस्तान) में रहते थे। इनकी माता रल्ला देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। दुर्भाग्य से जब सुखदेव तीन वर्ष के थे, तभी इनके पिताजी का देहांत हो गया। इनका लालन-पालन इनके ताऊ लाला अचिन्त राम ने किया।
ताऊ आर्य समाज से प्रभावित थे तथा समाज सेवा व देशभक्तिपूर्ण कार्यों में अग्रसर रहते थे। इसका प्रभाव बालक सुखदेव पर भी पड़ा। जब बच्चे गली-मोहल्ले में शाम को खेलते तो सुखदेव अस्पृश्य कहे जाने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करते थे। सुखदेव की उम्र जब करीब 12 साल की थी तब 1919 में हुए जलियांवाला बाग में भीषण नरसंहार हुआ। सुखदेव के मन पर भी इस घटना का बड़ा असर हुआ।