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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के पांच ऐतिहासिक फैसले, जिनसे होगा कुछ का फायदा, कुछ का नुकसान

Mon, 29 Jun 2020 04:20 PM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Mon, 29 Jun 2020 04:20 PM IST
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Punjab Haryana High Court Historical Judgements
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने कई अहम फैसले सुनाए। दो केस तो इतने अनोखे थे कि रोचक जजमेंट दी गई। पढ़ें ऐसे ही छह केस और फैसले...
Punjab Haryana High Court Historical Judgements
प्रतीकात्मक तस्वीर
कम उम्र में शादी करने को लेकर हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया और मैरिज रजिस्ट्रेशन करने का आदेश दिया। विवाह करने के लिए उम्र को लेकर दाखिल एक याचिका का निपटारा करते हुए पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत अगर न्यूनतम आयु सीमा का उल्लंघन करके शादी की गई तो उसे रद्द तो किया जा सकता है, लेकिन निष्प्रभावी नहीं।

याचिका दाखिल करते हुए दंपती की ओर से बताया गया कि जब 2015 में उन्होंने शादी की थी तो लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम की थी। 2019 में जब उन्होंने विवाह को रजिस्टर्ड करने के लिए आवेदन किया तो यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि शादी के समय लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम थी, इसलिए इसे रजिस्टर नहीं किया जा सकता। आवेदन खारिज करते हुए कहा गया कि यह विवाह हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किया गया है, इसलिए यह वैध नहीं है। विवाह के रजिस्ट्रेशन से जुड़े आवेदन के रद्द होने के बाद दंपती ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल लड़के की आयु 21 वर्ष से अधिक है और किसी भी पक्ष ने विवाह को अवैध करार देने से जुड़ा कोई आवेदन नहीं किया गया है। जब विवाह को अवैध करार देने से जुड़ा कोई आवेदन मिला ही नहीं है और अब वर-वधु दोनों बालिग हैं। इसलिए विवाह के रजिस्ट्रेशन में कोई अड़ंगा नहीं लगाया जाना चाहिए।

इस मामले में जब हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार से जवाब मांगा तो सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत न्यूनतम आयु का उल्लंघन करके की गई शादी रद्द करने योग्य है, लेकिन निष्प्रभावी नहीं। दोनों में से कोई भी इस विवाह से अलग भी नहीं होना चाहता है। इसके बाद हाईकोर्ट ने सरकार को दोनों का विवाह दो सप्ताह में रजिस्टर किए जाने के आदेश दे दिए।
Punjab Haryana High Court Historical Judgements
सांकेतिक तस्वीर
विवाह की फोटो शादी को साबित करने का दस्तावेज नहीं है। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान की। इसके साथ ही प्रेमी जोड़ों द्वारा घर से भागकर शादी करने के बाद सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट में दाखिल याचिकाओं में विवाह की फोटो के चलते दर्ज की जाने वाली आपत्तियों को अनावश्यक करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि आयु और नागरिकता संबंधी दस्तावेजों के आधार पर ही सुरक्षा के अधिकार के तहत जोड़ों को सुरक्षा उपलब्ध करवाने के आदेश दिए जा सकते हैं।

मामला पंजाब के रहने वाले एक प्रेमी जोड़े की सुरक्षा से जुड़ी याचिका का था, जिसमें हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने फोटो की वजह से ऑब्जेक्शन लगा दिया था। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री से जवाब मांगा तो बताया गया कि फोटो न लगाने पर कोई ऑब्जेक्शन नहीं लगाया जाता है, लेकिन यदि फोटो धुंधली है तो उस स्थिति में ऑब्जेक्शन लगाया जाता है। हाईकोर्ट ने कहा कि घर से भागने वाले प्रेमी जोड़े के पास संसाधनों का अभाव होता है। विवाह को प्रमाणित करने के लिए फोटो अनिवार्य नहीं होता और न ही सुरक्षा देने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। जब इस प्रकार के दस्तावेज की आवश्यकता ही नहीं होती है तो इसे अनिवार्य करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।

कोर्ट ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि सुरक्षा से जुड़ी याचिका के साथ विवाह की तस्वीरों को न रखा जाए। विवाह की तस्वीरें उसी स्थिति में रखी जाएं, जब एडवोकेट यह हलफनामा दे कि इस केस के लिए फोटो देना बहुत जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि घर से भागे प्रेमी जोड़े के विवाह की जो फोटो दिखाई जाती हैं, उनमें से कई में ग्रंथी या पंडित आदि कोई नजर नहीं आता। प्रेमी जोड़े मास्क में फोटो खिंचवाते हैं, जिनका कोई औचित्य नहीं है। ज्यादातर मामलों में यह फोटो किसी स्टूडियो में खींची नजर आती हैं, जिसका सुरक्षा से जुड़ी याचिका से कोई संबंध नहीं है।
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Punjab Haryana High Court Historical Judgements
सांकेतिक तस्वीर
पत्नी को क्रूर दिखाने के लिए उसकी जानकारी के बगैर कॉल रिकॉर्ड करना निजता के अधिकार का हनन है, जिसे किसी भी सूरत में प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। बच्चे की हिरासत को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए पंचकूला निवासी महिला ने बताया कि पति के साथ उसका वैवाहिक विवाद चल रहा है।

विवाद के दौरान पति उसकी चार साल की बेटी को लेकर चला गया। याचिकाकर्ता ने कहा कि ऐसा करना सीधे तौर पर उसकी बेटी की अवैध हिरासत में रखने जैसा है। उसने बताया कि बेटी किसके पास रहेगी इसको लेकर फैमिली कोर्ट में मामला विचाराधीन है। याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान बताया कि पति उसे क्रूर साबित करने के लिए उसके फोन कॉल रिकॉर्ड करता है तथा इसे उसने सुबूत के तौर पर पेश किया है।

हाईकोर्ट ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि कैसे कोई व्यक्ति किसी की निजता के अधिकार का हनन कर सकता है। जीवनसाथी के साथ फोन पर की गई बातचीत को बिना उसकी मंजूरी के रिकॉर्ड करना निजता के अधिकार के हनन का मामला बनता है। हाईकोर्ट ने रिकॉर्डिंग कर कोर्ट में इसे सबूत के तौर पर पेश करने वाले पति को जमकर फटकार लगाई।

कस्टडी का फैसला आने तक मां के पास रहेगी बेटी: हाईकोर्ट
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि बेटी की उम्र पांच वर्ष से कम है, ऐसे में जब तक उसकी कस्टडी को लेकर फैमिली कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता तब तक उसे उसकी मां के पास ही रखा जाए। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने महिला की याचिका का निपटारा कर दिया।
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सांकेतिक तस्वीर
किसी अपराध में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर के रजिस्टर्ड मालिक की यह दलील कि वह नंबर इस्तेमाल नहीं कर रहा है उसे आरोप मुक्त करने के लिए काफी नहीं है। नंबर के मालिक को यह स्पष्ट करना होगा कि कैसे उसके फोन का इस्तेमाल इस अपराध के लिए किया गया। यह टिप्पणी करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी व आईटी एक्ट में दर्ज एफ आई आर में अग्रिम जमानत की मांग को लेकर दाखिल याचिका को खारिज कर दिया।

मामला मोहाली का है, जहां पर फर्जी कॉल करने का आरोप लगाते हुए आईटी एक्ट में एफआईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में जो सिम कार्ड इस्तेमाल किया गया था वह शुभम सिंह के नाम पर दर्ज था।  याचिकाकर्ता ने कहा कि इस मामले में उसका नाम सजेशन शामिल किया जा रहा है जबकि फोन कॉल उसने नहीं किए थे। पंजाब सरकार की ओर से दलील दी गई कि केवाईसी के उपरांत इस सिम कार्ड को जारी किया गया था।

केवाईसी में याचिकाकर्ता ने अपने अंगूठे का निशान दिया था, ऐसे में इस नंबर के लिए वह पूरी तरह से जिम्मेदार है। जस्टिस एचएस सेठी ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि नंबर याचिकाकर्ता के नाम पर रजिस्टर्ड है और केवाईसी के उपरांत जारी किया गया है। याचिकाकर्ता की यह दलील की फोन का इस्तेमाल नहीं कर रहा था नंबर के प्रति उसकी जिम्मेदारी खत्म करने के लिए काफी नहीं है।

याचिकाकर्ता को यह बताना होगा कि नंबर का इस्तेमाल कौन कर रहा था और अपराध में वह शामिल नहीं है इसे साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा कि अभी तक फोन रिकवर नहीं हुआ है ऐसे में हिरासत में पूछताछ जरूरी है इसलिए याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत देने का कोई औचित्य नहीं बनता है।
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