आज अगर किसी के पास स्मार्टफोन या व्हाट्स ऐप नहीं होता तो लोग हंसने लगते है लेकिन सोचिए एक ऐसे गांव के बारे में जहां तो कुछ भी नहीं है।
आजादी के 70 साल बाद भी हरियाणा के पंचकूला जिले के पिंजौर ब्लॉक में एक ऐसा गांव है, जहां अब तक पक्की सड़कें नहीं हैं। गांव में आज तक एक भी एंबुलेंस नहीं गई। यहां के लोगों ने कभी गांव में किसी प्रशासनिक अधिकारी को आते नहीं देखा। विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले सरकार के नुमाइंदों के भी कभी गांववालों को दर्शन नहीं हुए।
गांव वालों में रोष है कि आम आदमी का दर्द समझने का दावा करने वाले नेता कहां हैं। आखिर क्यों उनका गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। सवाल यह भी है कि टेकभनोलॉजी के क्षेत्र में टॉपर देने वाले जिले के इस गांव में मोबाइल का नेटवर्क तक नहीं है। गांव की बदहाली को बयां करती अमर उजाला संवाददाता दीपक शाही की विशेष रिपोर्ट।
पहाड़ियों की गोद में बसा गांव गवाही। आबादी भी मात्र 350। गांव तक पहुंचने के लिए सात किलोमीटर लंबा पथरीला रास्ता। ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए हम गांव की ओर चले। रास्ते में चार युवक चारपाई पर एक बुजुर्ग को ले जाते मिले। पूछने पर पता चला कि बुजुर्ग बीमार हैं। उन्हें अस्पताल लेकर जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि गांव में एंबुलेंस नहीं आती। बीमार लोगों को इसी तरह अस्पताल पहुंचाया जाता है। हैरान परेशान हम आगे बढ़े तो कांधे पर थैला लादे एक और व्यक्ति मिला। उसने बताया कि घरेलू सामान सिर पर ढोकर ही ले जाना पड़ता है।
दुआ करते हैं कोई बीमार न हो
70 वर्षीय बुजुर्ग बेलो देवी ने बताया कि बीमार व्यक्ति को ले जाने के लिए अस्पताल तक पहुंचने का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए लोग इलाज से ज्यादा दुआ पर विश्वास करते हैं। जब भी किसी घर में कोई बीमार होता है तो उसे अस्पताल तक ले जाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। कितने ही बीमार अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में ही दम तोड़ चुके हैं। यहां भी एंबुलेंस आने से कतराती है। क्योंकि ऊबड़-खाबड़ कच्ची सड़क पर हादसे का भय रहता है।