जानिए, कारगिल युद्ध के एक ऐसे योद्धा के बारे में, जिसने शादी की उम्र में शहादत का जाम पिया था और मां-बाप तब से आज तक अखंड जोत जला रहे हैं। शहीद के मां-बाप से खास बातचीत...
जब कोई जांबाज सैनिक राष्ट्र की एकता व अखंडता को बरकरार रखते हुए शहीद हो जाता है तो उसकी शहादत अतीत के पन्नों में अंकित हो जाती है, मगर उस शहीद के परिजन अपने लाडले की शहादत की लौ को अपने दिल में संजो कर बाकी की जिंदगी उसकी याद में गुजार देते हैं। ऐसा ही एक परिवार है, कारगिल युद्ध में शहादत का जाम पीने वाले गांव सलाहपुर बेट निवासी सिपाही सतवंत सिंह का, जिनके लिए बेटे की शहादत एक इबादत बन चुकी है।
इसी इबादत को करते हुए सतवंत के परिजन पिछले 19 वर्षों से शहीद बेटे की प्रतिमा के सामने देसी घी की अखंड जोत प्रज्जवलित कर रहे हैं। यही नहीं पूरा परिवार शहीद की प्रतिमा के सामने भोग लगाने के बाद ही अन्न ग्रहण करता है। शहीद के पिता कश्मीर सिंह, मां सुखदेव कौर, भाई सतनाम सिंह, भाभी महिंदर कौर के मुताबिक, परिवार का हर सदस्य प्रतिमा को भोग लगाना अपना कर्तव्य समझता है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी।
शहीद सतवंत की माता सुखदेव कौर ने बताया कि सतवंत को हमने भगवान का दर्जा दिया है। जिस जगह पर उनकी प्रतिमा लगी हुई है, उस जगह को मंदिर की तरह पूजा जाता है। हर कोई जूते उतारकर अंदर जाता है। जिस दिन बेटे का अंतिम संस्कार हुआ, उसी दिन से वह उसकी तस्वीर के सामने अखंड जोत प्रज्ज्वलित कर रही हैं। 5 वर्ष पहले उन्होंने गांव भुल्लेचक्क में अपने शहीद बेटे की याद में बने पेट्रोल पंप पर अपने खर्च से उसकी प्रतिमा लगवाई थी। अब यह अखंड जोत वहां पर दिन रात जल रही है।
शहीद सतवंत सिंह की माता सुखदेव कौर ने बताया कि उनका बेटा 4 जुलाई 1999 को पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में टाइगर हिल को फतेह करते हुए शहीद हो गया था। कारगिल युद्ध के दौरान पठानकोट के मामून कैंट से सब से पहले 8 सिख यूनिट को वहां पर भेजा गया था। इस यूनिट के संयुक्त ऑपरेशन में पाकिस्तानी सेना के कई सैनिक मारे गए थे। वहीं 8 सिख यूनिट के 30 सैनिकों ने जान देकर टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया था, जिनमें सतवंत सिंह सबसे कम उम्र 21 वर्ष के थे।