कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे होने के बाद एक बड़ा सच सामने आया है और वो ये कि 1999 की जंग में चोटियों पर पाकिस्तानी सेना के साथ अफगान आतंकी भी डटे हुए थे। पढ़ें क्या था मामला...
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कारगिल विजय दिवस
- फोटो : अमर उजाला
1999 में कारगिल सेक्टर पर कब्जा करने लिए पाकिस्तान के इरादे इतने नापाक थे कि उसने कारगिल की चोटियों पर अपनी सेना के साथ-साथ अफगान उग्रवादियों को भी भेजा था। पाक सेना और उग्रवादियों को कोई पहचान न सके और वे स्थानीय लोगों जैसे ही दिखें, इसलिए घुसपैठिए सलवार-कुर्ता पहनकर एलओसी पार करके भारतीय सीमा में दाखिल हुए और दुर्गम चोटियों पर बनी भारतीय चौकियों पर काबिज हो गए।
एक विशेष रिपोर्ट का हवाला देते हुए सेना के ही एक आला अफसर ने बताया कि 4-5 मई 1999 को लेह और कारगिल क्षेत्र में भारतीय सेना की टुकड़ियों ने खास दौरा किया था। सूचना थी कि कुछ मुजाहिद्दीन व आतंकियों की घुसपैठ हुई है, लेकिन इस दौरे में घुसपैठियों से संबंधित कोई ठोस संकेत नहीं मिले थे। फिर बटालिक सेक्टर में गारखून गांव के एक गडरिये ने बताया था ऊंची चोटियों पर कुछ अपरिचित लोग भी डटे हुए हैं।
उसके बाद 8 मई को तुर्मिक क्षेत्र में पाकिस्तानी गश्ती दल से मुठभेड़ हुई और 9-10 मई की रात को 121 इंफेंट्री बिग्रेड मुख्यालय के पास भारी गोलाबारी हो गई। नॉर्दन कमांड अब तक ये समझ चुका था कि ये घुसपैठिए सिर्फ मुजाहिदीन नहीं, बल्कि माजरा कुछ और ही है। उधर, इन घुसपैठियों ने कारगिल सेक्टर में 204 किलोमीटर लंबे श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर गोलाबारी शुरू कर दी थी, ताकि लेह को कारिगल सेक्टर से अलग किया जा सके।
घुसपैठियों को पहुंच रही थी हेलीकॉप्टरों से मदद
रिपोर्ट के मुताबिक, कारगिल सेक्टर में घुसपैठिए चोटियों पर 15 से 17 हजार फुट की ऊंचाई पर जमे हुए थे और वहीं से हमला कर रहे थे। भारतीय जवान 12 हजार फुट की ऊंचाई पर ही सक्रिय थे। घुसपैठियों में अधिकतर पाक सेना के जवान और अफगान आंतकी थे, जो पाक सेना की तोपों से गोलाबारी करके बाकी को घुसपैठ करने में मदद कर रहे थे। इन घुसपैठियों को बाकायदा पाक सेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से रसद व गोला-बारूद पहुंचाया जा रहा था।