संग्राम का संघर्षः पैदल जाता था अखाड़े, लंगोट के लिए भी नहीं थे पैसे
अभिनय की दुनिया से उठकर इंटरनेशनल रेसलिंग में डैथ वारंट साइन कर फाइट जीतने वाले रेसलर संग्राम सिंह ने अपने बचपन का सीक्रेट खोल दिया। देखिए, क्या बोले वो।
संग्राम का संघर्षः पैदल जाता था अखाड़े, लंगोट के लिए भी नहीं थे पैसे
संग्राम सिंह कहते हैं कि संघर्ष के दिनों में वह प्रेक्टिस करने के लिए 20 किलोमीटर पैदल सफर तय करके अखाड़े में पहुंचते थे। घर की आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि कई बार लंगोट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। उन्होंने बताया कि मां ने मेरा पूरा साथ दिया। संग्राम ने बताया कि मां अपने हाथों से उनके लिए लंगोट बनातीं थीं। मां के बनाए लंगोट की बदौलत ही आज वह इस मुकाम तक पहुंचे हैं। अब फिर महामुकाबले के लिए वे तैयार हैं।
संग्राम का संघर्षः पैदल जाता था अखाड़े, लंगोट के लिए भी नहीं थे पैसे
मोहाली में 6 फरवरी को फाइट में वह अमेरिका के पहलवान रॉबी ई से भिड़ेंगे। फाइट मोहाली के फेज-9 स्थित इंटरनेशनल हॉकी स्टेडियम में शनिवार को शाम 6 बजे होगी। संग्राम ने बताया कि वर्ल्ड रेसलिंग प्रोफेशनल्स (डब्ल्यूडब्ल्यूपी) साउथ अफ्रीका के सहयोग से कुश्ती में युवकों का रुझान बढ़ाने के लिए वह प्रो कुश्ती लेकर आए हैं। इसमें युवा पहलवान प्रतिभा दिखाएंगे। मौके पर रेसलर अनान्जी, माइकल चार्ल्स (साउथ अफ्रीका) और सह संस्थापक जनार्दन पांडेय मौजूद रहे।
संग्राम का संघर्षः पैदल जाता था अखाड़े, लंगोट के लिए भी नहीं थे पैसे
फेज-9 स्थित हॉकी स्टेडियम में प्रेस वार्ता में संग्राम ने बताया कि खेल का फॉरमेट एमेच्योर ओर प्रो कुश्ती का मिलाजुला रूप है। चैंपियंस के प्रो कुश्ती में तीन-तीन मिनट के छह राउंड होंगे और प्रत्येक राउंड के बाद 45 सेकेंड का रेस्ट दिया जाएगा। भारत को कुश्ती का केंद्र बनाने के लिए दो साल में 10 ट्रेनिंग सेंटर खोले जाएंगे। इनमें सात सेंटर खोले जाने की तैयारी हो चुकी है। इनमें चंडीगढ़, गुड़गांव, कानपुर, इंदौर, भुवनेश्वर, मंगलोर और कोलकाता शामिल हैं।
संग्राम का संघर्षः पैदल जाता था अखाड़े, लंगोट के लिए भी नहीं थे पैसे
संग्राम ने बताया कि देश के भावी पहलवानों को चुनकर उन्हें प्रोफेशनल ट्रेनर ट्रेनिंग देंगे। उनके टैलेंट को परखने के लिए एक-दूसरे सेंटरों के पहलवानों की आपस में फाइट करवाई जाएगी। इसके बाद बेस्ट पहलवान को अंतरराष्ट्रीय स्तर अपना हुनर दिखाने का मौका मिलेगा। हम टीयर-2 और उससे आगे के कस्बों और गांवों में कुश्ती को प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि वहीं पर कुश्ती की शानदार प्रतिभाएं हैं जो कि अवसर का इंतजार कर रही हैं।