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Women's Day: 10 वीरांगनाएं, जो न कभी हारी थीं, न कभी हारेंगी...चुनौतियों से जीतकर बनीं 'खिलाड़ी'
Fri, 08 Mar 2019 12:56 PM IST
ajay kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: ajay kumar
Updated Fri, 08 Mar 2019 12:56 PM IST
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महिला दिवस (सांकेतिक तस्वीर)
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इंटरनेशनल वूमेन्स डे के मौके पर हम आपको सुना रहे हैं, उन 10 वीरांगनाओं के जज्बे की कहानी, जो न कभी न हारी थीं और न कभी हारेंगी। जो चुनौतियों से जीतकर खिलाड़ी बनीं और जिन्होंने आसमां की बुलंदियां छूकर सफलता की इबारत लिखी।
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शिप्राः जो स्कूल नहीं जा पाते, उनमें शिक्षा की अलख जगा रही
200 लड़कियों की गुरु शिप्रा
सड़कों पर भीख मांगते बच्चों को क्या देखा कि शिप्रा पसीज गईं। मन में सवाल उठा, हाथ में कलम थामने की उम्र में भीख मांगने और गाड़ियों की सफाई करने वाले बच्चे क्या कभी शिक्षा हासिल नहीं कर सकेंगे। इस सवाल ने इतना परेशान किया कि शिप्रा ने खुद प्रण ले लिया और ऐसे बच्चों में शिक्षा की अलख जगाने की ठान ली। इसके लिए पहले ऐसे बच्चों के अभिभावकों को खोजा। उन्हें अक्षर ज्ञान दिया, पढ़ाई करवाई। अब हालात यह हैं कि शिप्रा 200 बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दे रही हैं। वह 20 साल की उम्र में ही 200 लड़कियों की गुरु बन गईं।
शिप्रा की उड़ान यहीं तक नहीं है, वह जातिवाद के खिलाफ भी आवाज उठा रही हैं। यही कारण है कि वह अपने नाम के आगे सरनेम नहीं लगाती। उनका कहना है कि सरनेम जातिवाद को उजागर करता है। शिप्रा हरियाणा के भिवानी जिले की रहने वाली हैं। 2016 में वह चंडीगढ़ पहुंची तो भीख मांगने वाले बच्चों को देखा। उनकी हालत देखकर उन बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी, लेकिन दिक्कत थी खुद की पढ़ाई की भी। वह पीयू से स्नातक कर रही थीं। परिवार में पिता डॉ. पवन कुमार भारद्वाज को भी यह बात बताई। पहले तो परिवार के लोग राजी नहीं हुए, बाद में मान गए।
उनका तर्क था कि पहले खुद पैरों पर खड़ी हो जाएं और उसके बाद यह काम करें, लेकिन शिप्रा कहां मानने वाली थी। उन्होंने सेक्टर-25 में ऐसे बच्चों को चिन्हित किया और उनको पढ़ाई के लिए राजी किया। पीयू के सेक्टर 25 स्थित यूआईईटी में दो कमरे आवंटित कराए और पढ़ाई कराना शुरू कर दिया। पहले बच्चों का बेसिक क्लीयर किया और उसके बाद उन्हें साफ-सफाई के बारे में बताया गया। आज 200 से अधिक बच्चे उनसे शिक्षा ले रहे हैं। यही नहीं 20 से अधिक गरीब महिलाएं भी पढ़ने आ रही हैं। शिप्रा कहती हैं कि महिलाएं सशक्त हो रही हैं, लेकिन अभी इसके लिए और समय लगेगा।
शिप्रा की उड़ान यहीं तक नहीं है, वह जातिवाद के खिलाफ भी आवाज उठा रही हैं। यही कारण है कि वह अपने नाम के आगे सरनेम नहीं लगाती। उनका कहना है कि सरनेम जातिवाद को उजागर करता है। शिप्रा हरियाणा के भिवानी जिले की रहने वाली हैं। 2016 में वह चंडीगढ़ पहुंची तो भीख मांगने वाले बच्चों को देखा। उनकी हालत देखकर उन बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी, लेकिन दिक्कत थी खुद की पढ़ाई की भी। वह पीयू से स्नातक कर रही थीं। परिवार में पिता डॉ. पवन कुमार भारद्वाज को भी यह बात बताई। पहले तो परिवार के लोग राजी नहीं हुए, बाद में मान गए।
उनका तर्क था कि पहले खुद पैरों पर खड़ी हो जाएं और उसके बाद यह काम करें, लेकिन शिप्रा कहां मानने वाली थी। उन्होंने सेक्टर-25 में ऐसे बच्चों को चिन्हित किया और उनको पढ़ाई के लिए राजी किया। पीयू के सेक्टर 25 स्थित यूआईईटी में दो कमरे आवंटित कराए और पढ़ाई कराना शुरू कर दिया। पहले बच्चों का बेसिक क्लीयर किया और उसके बाद उन्हें साफ-सफाई के बारे में बताया गया। आज 200 से अधिक बच्चे उनसे शिक्षा ले रहे हैं। यही नहीं 20 से अधिक गरीब महिलाएं भी पढ़ने आ रही हैं। शिप्रा कहती हैं कि महिलाएं सशक्त हो रही हैं, लेकिन अभी इसके लिए और समय लगेगा।
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श्वेता गुलाटीः झुग्गी झोपड़ी वालों को बना दिया स्किल्ड
श्वेता गुलाटी
पंचकूला की श्वेता गुलाटी, शादी के बाद जब उन्होंने पति के घर में कदम रखा तो एक घरेलू महिला ही थीं। व्यापार क्या होता है, इंडस्ट्री क्या है, इससे उनका कोई ताल्लुक नहीं था, पर उनको यह नहीं पता था कि एक दिन घर के साथ-साथ बिजनेस की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। शादी के कुछ समय बाद श्वेता के पति ने उनको फैक्ट्री में बुलाया। जब वे पहुंची तो पति उनके साथ बिजनेस की जानकारियां शेयर करने लगे।
धीरे-धीरे श्वेता गुलाटी की रुचि कारखाने के काम में बढ़ गई। श्वेता ने एक दिन अपने पति को आइडिया दिया कि यदि महिला वर्कर रखी जाएं तो बेहतर होगा। इससे काम में तेजी आएगी। श्वेता ने अपने पति से पूछा कि क्या वह आसपास की झुग्गियों में रहने वाली महिलाओं से बात करें। पति ने हां कहा तो श्वेता ने उनके साथ संपर्क साधा।
श्वेता ने समझाया तो महिलाएं फैक्ट्री में काम करने के लिए राजी हो गईं। जब कुछ दिन महिलाओं ने काम किया तो उनको अच्छा लगने लगा। उन महिलाओं को देखते-देखते दूसरी महिलाएं भी आने लगीं। श्वेता कहती हैं कि इससे दो फायदे हुए। एक ये कि महिलाओं को रोजगार मिल गया, वे सशक्त हो गईं। दूसरा ये कि उनमें आत्मविश्वास आया कि वे भी कुछ कर सकती हैं। पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकती हैं।
धीरे-धीरे श्वेता गुलाटी की रुचि कारखाने के काम में बढ़ गई। श्वेता ने एक दिन अपने पति को आइडिया दिया कि यदि महिला वर्कर रखी जाएं तो बेहतर होगा। इससे काम में तेजी आएगी। श्वेता ने अपने पति से पूछा कि क्या वह आसपास की झुग्गियों में रहने वाली महिलाओं से बात करें। पति ने हां कहा तो श्वेता ने उनके साथ संपर्क साधा।
श्वेता ने समझाया तो महिलाएं फैक्ट्री में काम करने के लिए राजी हो गईं। जब कुछ दिन महिलाओं ने काम किया तो उनको अच्छा लगने लगा। उन महिलाओं को देखते-देखते दूसरी महिलाएं भी आने लगीं। श्वेता कहती हैं कि इससे दो फायदे हुए। एक ये कि महिलाओं को रोजगार मिल गया, वे सशक्त हो गईं। दूसरा ये कि उनमें आत्मविश्वास आया कि वे भी कुछ कर सकती हैं। पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकती हैं।
समाजसेवा के लिए पहनी पुलिस की वर्दी: डीएसपी रश्मि यादव
डीएसपी रश्मि यादव
कभी माता-पिता के साथ घर के बाहर घूमने जाती तो अकसर पुलिस वाले दिखाई देते थे। कुछ रिश्तेदार भी पुलिस में थे। कभी-कभी पुलिस की वर्दी में महिलाएं भी दिखती थीं, तब लगता था कि मैं भी एक दिन वर्दी पहनूंगी और लोगों की सेवा करूंगी। बचपन का यह ख्वाब बड़े होकर कैसे हकीकत में बदलेगा, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था, पर ख्वाब पूरा हो गया। यह कहना है डीएसपी रश्मि यादव का। तेजतर्रार और हर मोर्चे पर डटी रहने वाली रश्मि यादव ने बताया कि उन्होंने सात वर्ष की उम्र में पुलिस अफसर बनने का सपना देखा था।
सपना देखना एक बात होती है और उसे पूरा करना दूसरी। घरवाले चाहते थे कि वह एक डॉक्टर बनें, पर उन्होंने ठान लिया था कि वह पुलिस अधिकारी ही बनेंगी। हालांकि घरवालों ने उनको कुछ समय के लिए मेडिकल की पढ़ाई करने को अमृतसर भेज दिया था, पर किस्मत उनके साथ रही। उन्होंने परीक्षाएं तो कई दीं, पर उनका चयन हुआ वर्ष 2009 में दानिप्स कैडर में। उस समय उनकी पोस्टिंग नई दिल्ली में हुई और कुछ वर्ष बाद चंडीगढ़ आ गईं। अभी वह चंडीगढ़ साइबर सेल, आईआरबी और पीईबी ब्रांच में डीएसपी पद पर तैनात हैं।
रश्मि बताती हैं कि उन्होंने कई परीक्षाओं के साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। इसके लिए उन्होंने घरवालों को बताया तक नहीं। जब रिजल्ट आया तो वह चयनित हो गईं थीं। अब जैसे ही यह बात घरवालों को पता चली तो वह काफी नाखुश हुए। घरवाले नहीं चाहते थी कि उनकी बेटी पुलिस बने। शायद कुछ डर था, लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। किसी तरह उन्होंने अपने घरवालों को राजी किया और वर्ष 2011 में ट्रेनिंग पर गईं।
सपना देखना एक बात होती है और उसे पूरा करना दूसरी। घरवाले चाहते थे कि वह एक डॉक्टर बनें, पर उन्होंने ठान लिया था कि वह पुलिस अधिकारी ही बनेंगी। हालांकि घरवालों ने उनको कुछ समय के लिए मेडिकल की पढ़ाई करने को अमृतसर भेज दिया था, पर किस्मत उनके साथ रही। उन्होंने परीक्षाएं तो कई दीं, पर उनका चयन हुआ वर्ष 2009 में दानिप्स कैडर में। उस समय उनकी पोस्टिंग नई दिल्ली में हुई और कुछ वर्ष बाद चंडीगढ़ आ गईं। अभी वह चंडीगढ़ साइबर सेल, आईआरबी और पीईबी ब्रांच में डीएसपी पद पर तैनात हैं।
रश्मि बताती हैं कि उन्होंने कई परीक्षाओं के साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। इसके लिए उन्होंने घरवालों को बताया तक नहीं। जब रिजल्ट आया तो वह चयनित हो गईं थीं। अब जैसे ही यह बात घरवालों को पता चली तो वह काफी नाखुश हुए। घरवाले नहीं चाहते थी कि उनकी बेटी पुलिस बने। शायद कुछ डर था, लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। किसी तरह उन्होंने अपने घरवालों को राजी किया और वर्ष 2011 में ट्रेनिंग पर गईं।
कुछ कर गुजरने की ठान लें तो कोई काम मुश्किल नहीं: निशा सिंगला
निशा सिंगला
एक वक्त ऐसा था कि औरत का घर की चौखट से बाहर निकलना मुश्किल था, लेकिन आज महिलाओं ने खुद को सशक्त बना लिया है। आज वह घर से न निकलें, तो बड़े-बड़े काम रुक जाएं। ऐसी ही एक महिला हैं, बिजनेस वूमन निशा सिंगला। जिन्होंने अपनी शादी के बाद कई बंदिशें बर्दाश्त कीं, पर उन्हें कभी तोड़ने की कोशिश की नहीं की, बस सही वक्त का इंतजार किया।
पति संदीप सिंगला ने जब मॉल खोला तो उनके लिए मुश्किल थी कि कोई ऐसा साथी हो, जो आत्मविश्वास से भरा हो। निशा ने उनकी परेशानी देखते हुए साथ देने की बात की तो पति को उनकी बात जम गई। पति भी कहां कम थे, उन्होंने भी परखने की सोची। जब वह मॉल पहुंचीं तो उनको एक कठिन जिम्मेदारी दे दी गई। अब चुनौती थी, खुद को साबित करने की, जिसमें वह सफल हो गईं।
निशा सिंगला ने बताया कि मॉल की देखरेख से जुड़ी सारी खरीदारी उनको ही करनी होती है। एक हजार ब्रांड और उनमें से किसे खरीदना है और किसे नहीं, यह तय करना भी उन्हीं का काम होता है। उनके बच्चे छोटे थे, तो भी वह घर में बच्चों की केयर करने के बाद सीधे मॉल पहुंचती थीं। यदि इंसान ठान ले तो कोई काम कठिन नहीं है।
पति संदीप सिंगला ने जब मॉल खोला तो उनके लिए मुश्किल थी कि कोई ऐसा साथी हो, जो आत्मविश्वास से भरा हो। निशा ने उनकी परेशानी देखते हुए साथ देने की बात की तो पति को उनकी बात जम गई। पति भी कहां कम थे, उन्होंने भी परखने की सोची। जब वह मॉल पहुंचीं तो उनको एक कठिन जिम्मेदारी दे दी गई। अब चुनौती थी, खुद को साबित करने की, जिसमें वह सफल हो गईं।
निशा सिंगला ने बताया कि मॉल की देखरेख से जुड़ी सारी खरीदारी उनको ही करनी होती है। एक हजार ब्रांड और उनमें से किसे खरीदना है और किसे नहीं, यह तय करना भी उन्हीं का काम होता है। उनके बच्चे छोटे थे, तो भी वह घर में बच्चों की केयर करने के बाद सीधे मॉल पहुंचती थीं। यदि इंसान ठान ले तो कोई काम कठिन नहीं है।
न्यूजपेपर बांटने का काम करने वाली कृष्णा
दूसरों के आगे हाथ फैलाने की बजाए मेहनत करना पसंद
कृष्णा पिछले 3 सालों से पंचकूला के अलग-अलग गांवों में अल सुबह अखबार बांटने जाती हैं। पहले वह स्कूल में आया का काम करती थीं। वह हमेशा से ही खुद मेहनत करके कुछ अलग कर दिखाने की इच्छा रखती आई हैं। इसलिए 2016 में उन्होंने अपने पति के कहने पर उनके साथ न्यूज एजेंसी के लिए काम करना शुरू किया।
कृष्णा मात्र एक ऐसी महिला हैं, जो अल सुबह ऐेसे इलाकों में पैदल जाकर अखबार बांटती हैं, जहां न तो सड़कें बनी हैं और न ही व्हीकल के आने-जाने की कोई सुविधा है। कृष्णा का कहना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बस दिल में काम करने की इच्छा होनी चाहिए।
समाज की और लोगों की बातों को इग्नोर करके महिलाओं को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। हाल ही में फरवरी महीने में उनकी बेटी की शादी हुई। इस पर हुए खर्चे में उन्होंने अपने पति को आर्थिक रूप से सहयोग भी दिया।
कृष्णा पिछले 3 सालों से पंचकूला के अलग-अलग गांवों में अल सुबह अखबार बांटने जाती हैं। पहले वह स्कूल में आया का काम करती थीं। वह हमेशा से ही खुद मेहनत करके कुछ अलग कर दिखाने की इच्छा रखती आई हैं। इसलिए 2016 में उन्होंने अपने पति के कहने पर उनके साथ न्यूज एजेंसी के लिए काम करना शुरू किया।
कृष्णा मात्र एक ऐसी महिला हैं, जो अल सुबह ऐेसे इलाकों में पैदल जाकर अखबार बांटती हैं, जहां न तो सड़कें बनी हैं और न ही व्हीकल के आने-जाने की कोई सुविधा है। कृष्णा का कहना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बस दिल में काम करने की इच्छा होनी चाहिए।
समाज की और लोगों की बातों को इग्नोर करके महिलाओं को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। हाल ही में फरवरी महीने में उनकी बेटी की शादी हुई। इस पर हुए खर्चे में उन्होंने अपने पति को आर्थिक रूप से सहयोग भी दिया।
पति से तलाक लेकर बच्ची को अकेले पाल रही पूनम
नशेड़ी पति को छोड़कर खुद संभाला बेटी को
डीसी मॉडल स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत पूनम ने नशेड़ी पति को तलाक दिया और अब अपनी बेटी के साथ अकेली रह रही हैं। अपनी बेटी का पालन-पोषण कर रही हैं। पूनम ने बताया कि उनकी शादी बहुत कम उम्र हो गई थी, लेकिन पति को नशे की लत थी। वह सिर्फ 7वीं पास था और कोई काम भी नहीं करता था।
उनके पति का सच सामने न आ जाए, इसलिए उनके ससुरालवालों ने दस दिनों में ही उनकी शादी कर दी थी। शादी के बाद पति उनके साथ मारपीट करता था और एक साल बाद बेटी पैदा हुई, तो भी उनका मारना पीटना बंद नहीं हुआ। बल्कि वह बढ़ गया। जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो तलाक लेने का फैसला ले लिया।
आज वह किराए के घर में रहकर स्वयं अपनी बेटी का पालन-पोषण कर रही हैं। पूनम का मानना है कि महिलाओं को अपराध सहन करने की बजाए उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और अपनी पढ़ाई को व्यर्थ न गवां कर खुद अपना खर्च उठाना चाहिए।
डीसी मॉडल स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत पूनम ने नशेड़ी पति को तलाक दिया और अब अपनी बेटी के साथ अकेली रह रही हैं। अपनी बेटी का पालन-पोषण कर रही हैं। पूनम ने बताया कि उनकी शादी बहुत कम उम्र हो गई थी, लेकिन पति को नशे की लत थी। वह सिर्फ 7वीं पास था और कोई काम भी नहीं करता था।
उनके पति का सच सामने न आ जाए, इसलिए उनके ससुरालवालों ने दस दिनों में ही उनकी शादी कर दी थी। शादी के बाद पति उनके साथ मारपीट करता था और एक साल बाद बेटी पैदा हुई, तो भी उनका मारना पीटना बंद नहीं हुआ। बल्कि वह बढ़ गया। जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो तलाक लेने का फैसला ले लिया।
आज वह किराए के घर में रहकर स्वयं अपनी बेटी का पालन-पोषण कर रही हैं। पूनम का मानना है कि महिलाओं को अपराध सहन करने की बजाए उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और अपनी पढ़ाई को व्यर्थ न गवां कर खुद अपना खर्च उठाना चाहिए।
नीरू: अकेलेपन को कमजोरी नहीं बनने दिया, आज महिलाओं को देती हैं फिट रहने के टिप्स
नीरू सैनी
49 वर्षीय नीरू सैनी पेशे से तो विज्ञान विषय की शिक्षिका हैं, लेकिन बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ वह महिलाओं को स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित भी करती हैं। उनका कहना है कि महिलाएं अकसर घर के काम और परिवार के चक्कर में अपने स्वास्थ्य का ख्याल नहीं रखतीं। घर की महिला स्वस्थ रहेगी तो पूरा परिवार निरोग रहेगा। इसके लिए उन्होंने पिंकथॉन कैंपेन भी शुरू किया है।
हालांकि इन सब को शुरू करने से पहले उन्होंने अपनी जिंदगी के साथ एक लंबा संघर्ष किया और विजय पाई। मौली जागरां स्थित सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल की साइंस टीचर नीरू सैनी 2002 में पति के निधन के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गईं। दो बेटियां हैं, जो पढ़ाई और नौकरी की वजह से बाहर रहती हैं। ऐसे में वह डिप्रेशन का शिकार हो गईं थीं, पर उन्होंने हार नहीं मानी और खुद को इस बीमारी से निकालने का संकल्प लिया।
इसके लिए उन्होंने साइकिलिंग और रनिंग शुरू की। आज वह डिप्रेशन से बाहर आ चुकी हैं और शहर की लड़कियों से लेकर महिलाओं तक को अकेलेपन और अन्य दूसरी बीमारियों से बाहर निकालने का काम कर रही हैं। साथ ही वह महिलाओं के लिए जागरुकता कैंप एवं पिंकथॉन का भी आयोजन करती रहती हैं।
हालांकि इन सब को शुरू करने से पहले उन्होंने अपनी जिंदगी के साथ एक लंबा संघर्ष किया और विजय पाई। मौली जागरां स्थित सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल की साइंस टीचर नीरू सैनी 2002 में पति के निधन के बाद बिल्कुल अकेले पड़ गईं। दो बेटियां हैं, जो पढ़ाई और नौकरी की वजह से बाहर रहती हैं। ऐसे में वह डिप्रेशन का शिकार हो गईं थीं, पर उन्होंने हार नहीं मानी और खुद को इस बीमारी से निकालने का संकल्प लिया।
इसके लिए उन्होंने साइकिलिंग और रनिंग शुरू की। आज वह डिप्रेशन से बाहर आ चुकी हैं और शहर की लड़कियों से लेकर महिलाओं तक को अकेलेपन और अन्य दूसरी बीमारियों से बाहर निकालने का काम कर रही हैं। साथ ही वह महिलाओं के लिए जागरुकता कैंप एवं पिंकथॉन का भी आयोजन करती रहती हैं।
15 साल से लड़कियों को दे रहीं मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग
मार्शल आर्ट ट्रेनर त्रिलोक कुमारी
देश में महिलाओं एवं लड़कियों के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं। आए दिन लड़कियां कभी छेड़छाड़, कभी दुष्कर्म तो कभी घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। ऐसे में लड़कियों को खुद अपनी रक्षा करनी होगी। यही सोचकर 30 वर्षीय त्रिलोक कुमारी उर्फ रोजी ने लड़कियों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देने की सोची। इसके लिए पहले खुद ट्रेनिंग ली।
अब पिछले 15 वर्षों से वह लड़कियों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दे रही हैं। वह न केवल लड़कियों को सेल्फ डिफेंस के गुर सिखाती हैं, बल्कि खुद भी कई बार सड़क पर मनचलों को दुरुस्त कर चुकी हैं। रोजी मार्शल आर्ट की ट्रेनर हैं और बद्दी, पंचकूला से लेकर चंडीगढ़ में लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रही हैं।
उन्होंने बताया कि देश की हर लड़की को मार्शल आर्ट सीखना चाहिए, ताकि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें। वे अपना गुरु मार्शल आर्ट मास्टर बिक्रम सिंह राणा को मानती हैं। उनके पिता तिलक राज ने उनको पांच साल की उम्र में मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दिलानी शुरू कर दी थीं। आज वह अपनी सात साल की बेटी को भी मार्शल आर्ट सीखा रही हैं।
अब पिछले 15 वर्षों से वह लड़कियों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दे रही हैं। वह न केवल लड़कियों को सेल्फ डिफेंस के गुर सिखाती हैं, बल्कि खुद भी कई बार सड़क पर मनचलों को दुरुस्त कर चुकी हैं। रोजी मार्शल आर्ट की ट्रेनर हैं और बद्दी, पंचकूला से लेकर चंडीगढ़ में लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रही हैं।
उन्होंने बताया कि देश की हर लड़की को मार्शल आर्ट सीखना चाहिए, ताकि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें। वे अपना गुरु मार्शल आर्ट मास्टर बिक्रम सिंह राणा को मानती हैं। उनके पिता तिलक राज ने उनको पांच साल की उम्र में मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दिलानी शुरू कर दी थीं। आज वह अपनी सात साल की बेटी को भी मार्शल आर्ट सीखा रही हैं।
पंजाब-हरियाणा को तंबाकू फ्री बनाने में जुटीं उपिंदर
उपिंदरप्रीत कौर
आज बेटे ही नहीं बेटियां भी मां-बाप की विरासत संभाल रही हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हैं, पार्षद उपिंदर प्रीत कौर गिल। इनका कहना है कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए बस अपने ऊपर विश्वास होना चाहिए, बाकि आपकी मेहनत, सफलता के दरवाजे खुद ही खुलने लगते हैं। उनकी मां ने पंजाब को नशा मुक्त करने की जो मुहिम चलाई थी, उसे अब वह आगे बढ़ा रही हैं। वह पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों को तंबाकू फ्री बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। इसके लिए उनका प्रोजेक्ट तैयार हो चुका है। उम्म्मीद है कि दोनों राज्यों की सरकारें भी अब इस दिशा में काम करेंगी।
भाई न होने का कभी अहसास नहीं होने दिया
उपिंदर बताती हैं कि वह अपने परिवार में दो बहनें हैं। उनका भाई नहीं है, लेकिन उनके मां-बाप ने कभी इसका अहसास उन्हें होने नहीं दिया। उनकी माता पूर्व पार्षद व एडवोकेट स्व. अमितेश्वर कौर व पिता ने उनकी बढ़िया तरीके से परवरिश की। टॉप के स्कूलों से पढ़ाया। यूएसए की नामी यूनिवर्सिटी से एमबीए फाइनेंस कराई। साल 2011 में वह इंडिया आ गईं।
मां ने ऐसे शुरू की थी संस्था
उपिंदर ने बताया कि उनकी माता अमितेश्वर कौर हाईकोर्ट की वकील थीं। 1996 में उनकी माता ने पंजाब को तंबाकू व नशा मुक्त बनाने के लिए काम किया। उन्होंने जेनरेशन सेवियर नाम से संस्था बनाई थी। यह संस्था पब्लिक हेल्थ के प्रोजेक्टों पर भी काम करती है। भारत सरकार के कई प्रोजेक्ट व डब्ल्यूएचओ के प्रोजेक्टों के साथ काम कर कर चुकी हैं। 2015 में मां अमितेश्वर कौर की अचानक मौत हो गई थी। वह उस समय तीसरी बार जीतकर पार्षद बनीं थीं, लेकिन मां की मौत से पूरा परिवार सदमे में था।
उस समय उपिंदर की शादी को केवल चौदह दिन हुए थे। ऐसे में अपनी मां के द्वारा शुरू किए प्रयासों को आगे कैसे बढ़ाया जाए, उसे लेकर उनके मन में कई तरह के सवाल थे। उनमें यह भी संदेह था कि क्या सोसाइटी उन्हें स्वीकार करेगी। ससुराल वाले क्या इसमें सहयोग करेंगे, लेकिन उन्हें सबका सहयोग मिला और वह आगे बढ़ती चली गईं। साथ ही उन्होंने दोनों परिवारों की जिम्मेदारियों को भी पूरा किया। वह चुनावी जीतीं। उनकी मां ने अपने जिस प्रोजेक्ट को जहां छोड़ा था, वह उसे वहीं से आगे लेकर चलीं। वह प्रोजेक्ट अब हरियाणा में पहुंच गया है।
भाई न होने का कभी अहसास नहीं होने दिया
उपिंदर बताती हैं कि वह अपने परिवार में दो बहनें हैं। उनका भाई नहीं है, लेकिन उनके मां-बाप ने कभी इसका अहसास उन्हें होने नहीं दिया। उनकी माता पूर्व पार्षद व एडवोकेट स्व. अमितेश्वर कौर व पिता ने उनकी बढ़िया तरीके से परवरिश की। टॉप के स्कूलों से पढ़ाया। यूएसए की नामी यूनिवर्सिटी से एमबीए फाइनेंस कराई। साल 2011 में वह इंडिया आ गईं।
मां ने ऐसे शुरू की थी संस्था
उपिंदर ने बताया कि उनकी माता अमितेश्वर कौर हाईकोर्ट की वकील थीं। 1996 में उनकी माता ने पंजाब को तंबाकू व नशा मुक्त बनाने के लिए काम किया। उन्होंने जेनरेशन सेवियर नाम से संस्था बनाई थी। यह संस्था पब्लिक हेल्थ के प्रोजेक्टों पर भी काम करती है। भारत सरकार के कई प्रोजेक्ट व डब्ल्यूएचओ के प्रोजेक्टों के साथ काम कर कर चुकी हैं। 2015 में मां अमितेश्वर कौर की अचानक मौत हो गई थी। वह उस समय तीसरी बार जीतकर पार्षद बनीं थीं, लेकिन मां की मौत से पूरा परिवार सदमे में था।
उस समय उपिंदर की शादी को केवल चौदह दिन हुए थे। ऐसे में अपनी मां के द्वारा शुरू किए प्रयासों को आगे कैसे बढ़ाया जाए, उसे लेकर उनके मन में कई तरह के सवाल थे। उनमें यह भी संदेह था कि क्या सोसाइटी उन्हें स्वीकार करेगी। ससुराल वाले क्या इसमें सहयोग करेंगे, लेकिन उन्हें सबका सहयोग मिला और वह आगे बढ़ती चली गईं। साथ ही उन्होंने दोनों परिवारों की जिम्मेदारियों को भी पूरा किया। वह चुनावी जीतीं। उनकी मां ने अपने जिस प्रोजेक्ट को जहां छोड़ा था, वह उसे वहीं से आगे लेकर चलीं। वह प्रोजेक्ट अब हरियाणा में पहुंच गया है।
गरीब बच्चों में शिक्षा का अलख जगातीं राजपाल कौर
प्रतीकात्मक तस्वीर
बच्चे सेटल हो चुके हैं, एक विदेश में है, तो दूसरे का पटियाला में पेट्रोल पंप है, लेकिन बुजुर्ग राजपाल कौर मस्त ने अपने स्वर्गीय पति हरभजन सिंह मस्त के सपने को पूरा करने के लिए ऐशोआराम छोड़ा। वह झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रही हैं।
21 नंबर फाटक के पुल के नीचे राजपाल कौर मस्त पिछले कई सालों से मस्ती की पाठशाला चला रही हैं, जिसमें वह अपनी कुछ महिला दोस्तों की मदद के साथ गरीब बच्चों को पढ़ाकर उनका भविष्य संवार रही हैं। उन्हें स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, अच्छे संस्कार देती हैं। उनकी पाठशाला में जनरल नॉलेज भी दी जाती है।
राजपाल कौर मस्त अपनी इस पाठशाला में अब तक 500 से ज्यादा बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देकर स्कूलों में उनका दाखिला करा चुकी हैं। अमर उजाला से बात करते हुए राजपाल कौर मस्त ने बताया कि उनके पति का सपना था, अपनी सारी जिम्मेदारियों से फ्री होकर वह स्लम एरिया में रहने वाले बच्चों को शिक्षित करेंगे।
लेकिन भगवान को यह मंजूर नहीं था। वे अपना सपना पूरा नहीं कर सके। मैंने अपने पति के इस सपने को अपना जुनून बना लिया और बच्चों को शिक्षित करने की मुहिम में जुट गईं।
21 नंबर फाटक के पुल के नीचे राजपाल कौर मस्त पिछले कई सालों से मस्ती की पाठशाला चला रही हैं, जिसमें वह अपनी कुछ महिला दोस्तों की मदद के साथ गरीब बच्चों को पढ़ाकर उनका भविष्य संवार रही हैं। उन्हें स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, अच्छे संस्कार देती हैं। उनकी पाठशाला में जनरल नॉलेज भी दी जाती है।
राजपाल कौर मस्त अपनी इस पाठशाला में अब तक 500 से ज्यादा बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देकर स्कूलों में उनका दाखिला करा चुकी हैं। अमर उजाला से बात करते हुए राजपाल कौर मस्त ने बताया कि उनके पति का सपना था, अपनी सारी जिम्मेदारियों से फ्री होकर वह स्लम एरिया में रहने वाले बच्चों को शिक्षित करेंगे।
लेकिन भगवान को यह मंजूर नहीं था। वे अपना सपना पूरा नहीं कर सके। मैंने अपने पति के इस सपने को अपना जुनून बना लिया और बच्चों को शिक्षित करने की मुहिम में जुट गईं।