वूमेन्स डे के मौके पर आपको सुनाते हैं एक ऐसी महिला सरपंच की कहानी, जिसने लोगों की सोच बदली और गांव के दामन पर लगा बड़ा दाग धो दिया।
बेटियों को कोख में मारने का दाग झेल चुके हरियाणा के एक गांव ने ऐसा दाग धोया कि हर कोई चौंक गया। वहां के बुजुर्गों की सोच ऐसी बदली कि बेटियां बढ़ गईं। सबसे बड़ा श्रेय पांच साल पहले गांव की सरपंच बनीं कमला देवी को जाता है। अशिक्षित होने के बावजूद कमला देवी ने ऐसा करके भी दिखाया। ये गांव है हरियाणा में सोनीपत जिले का राई।
एक समय ऐसा था कि वर्ष 2005 तक 1000 लड़कों के मुकाबले केवल 760 लड़कियां होती थीं, जो छह साल में बढ़कर लगभग 825 पहुंच गया। लेकिन जिस तरह से आबादी बढ़ रही थी, उसके अनुसार बेटियों की संख्या में यह बढ़ोतरी ना के बराबर थी। उसी दौरान गांव की सरपंची की कमान अशिक्षित बुजुर्ग महिला कमला देवी ने संभाली और सरकार की ओर से उनको गांव के लिंगानुपात के बारे में बताया गया।
कमला देवी ने तभी बेटियों को कोख में मारने की रूढ़ीवादी सोच को बदलने का बीड़ा उठा लिया। कमला देवी ने सरपंच बनते ही खुद बुजुर्ग लोगों के बीच जाकर बेटियों के प्रति उनकी सोच बदली। लोगों को बताया गया कि बेटियां भी गांव की तस्वीर बदल सकती है और वह अपने साथ ही उन बेटियों की मिसाल लोगों को देती थी जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ गई और परिवार को मेहनत के बल पर गरीबी से उभारा।
उसका ही परिणाम है कि आज गांव में जहां 1000 लड़के है तो वहीं 1205 लड़कियां है। गांव में हुए इस बदलाव के कारण ही सरकार ने पंचायत का सम्मान भी किया और उस सम्मान कार्यक्रम में हर कोई अपनी बेटियों को लेकर पहुंचा। 7 हजार से ज्यादा की आबादी वाले गांव में यह बदलाव कोई कम नहीं है, क्योंकि जिस गांव में लिंगानुपात एक साल में 5-10 प्रतिशत तक बढ़ता था, वहां वह बदलाव 100 गुणा तक पहुंच गया।