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बेमिसालः इस महिला सरपंच ने लोगों की सोच बदली और धो दिया दामन पर लगा दाग

Thu, 09 Mar 2017 09:28 AM IST
अंकित चौहान/आशीष वर्मा/अमर उजाला, रोहतक/चंडीगढ़
अंकित चौहान/आशीष वर्मा/अमर उजाला, रोहतक/चंडीगढ़ Updated Thu, 09 Mar 2017 09:28 AM IST
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international women's day, salute to haryana sonipat village sarpanch kamla devi, sex ratio in india
महिला सरपंच कमला देवी
वूमेन्स डे के मौके पर आपको सुनाते हैं एक ऐसी महिला सरपंच की कहानी, जिसने लोगों की सोच बदली और गांव के दामन पर लगा बड़ा दाग धो दिया।
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महिला सरपंच कमला देवी
बेटियों को कोख में मारने का दाग झेल चुके हरियाणा के एक गांव ने ऐसा दाग धोया कि हर कोई चौंक गया। वहां के बुजुर्गों की सोच ऐसी बदली कि बेटियां बढ़ गईं। सबसे बड़ा श्रेय पांच साल पहले गांव की सरपंच बनीं कमला देवी को जाता है। अशिक्षित होने के बावजूद कमला देवी ने ऐसा करके भी दिखाया। ये गांव है हरियाणा में सोनीपत जिले का राई।
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गर्ल चाइल्ड
एक समय ऐसा था कि वर्ष 2005 तक 1000 लड़कों के मुकाबले केवल 760 लड़कियां होती थीं, जो छह साल में बढ़कर लगभग 825 पहुंच गया। लेकिन जिस तरह से आबादी बढ़ रही थी, उसके अनुसार बेटियों की संख्या में यह बढ़ोतरी ना के बराबर थी। उसी दौरान गांव की सरपंची की कमान अशिक्षित बुजुर्ग महिला कमला देवी ने संभाली और सरकार की ओर से उनको गांव के लिंगानुपात के बारे में बताया गया।

 
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कमला देवी ने तभी बेटियों को कोख में मारने की रूढ़ीवादी सोच को बदलने का बीड़ा उठा लिया। कमला देवी ने सरपंच बनते ही खुद बुजुर्ग लोगों के बीच जाकर बेटियों के प्रति उनकी सोच बदली। लोगों को बताया गया कि बेटियां भी गांव की तस्वीर बदल सकती है और वह अपने साथ ही उन बेटियों की मिसाल लोगों को देती थी जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ गई और परिवार को मेहनत के बल पर गरीबी से उभारा।
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उसका ही परिणाम है कि आज गांव में जहां 1000 लड़के है तो वहीं 1205 लड़कियां है। गांव में हुए इस बदलाव के कारण ही सरकार ने पंचायत का सम्मान भी किया और उस सम्मान कार्यक्रम में हर कोई अपनी बेटियों को लेकर पहुंचा। 7 हजार से ज्यादा की आबादी वाले गांव में यह बदलाव कोई कम नहीं है, क्योंकि जिस गांव में लिंगानुपात एक साल में 5-10 प्रतिशत तक बढ़ता था, वहां वह बदलाव 100 गुणा तक पहुंच गया।
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