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साल 2019 में पति-पत्नी के रिश्ते पर हाईकोर्ट ने सुनाए 8 ऐतिहासिक फैसले, दो केस अनदेखे-अनसुने
Mon, 30 Dec 2019 09:24 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 30 Dec 2019 09:24 AM IST
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साल 2019 में पति-पत्नी के संबंधों पर दायर की गई याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने अहम फैसले सुनाए। दो केस तो इतने अनोखे थे कि रोचक जजमेंट दी गई। पढ़ें ऐसे ही 8 केस और फैसले...
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पत्नी ने मांगी मंथली मेंटेनेंस तो पति ने थमाए 24, 600 रुपये के सिक्के
फाइल फोटो
केस की सुनवाई चल रही थी कि वकील ने जज की टेबल पर अचानक एक ऐसी चीज रख दी, देखकर सभी के होश उड़ गए, लेकिन पत्नी बिफर गई। फिर जो हुआ वह चौंकाने वाला था। मामला चंडीगढ़ जिला अदालत का है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक वकील और उनकी पत्नी के बीच चल रहे तलाक के केस में मंगलवार को जिला अदालत में उस समय अजीब स्थिति बन गई, जब पत्नी को मंथली मेंटेनेंस के तौर पर पति ने 24600 रुपये के सिक्के थमा दिए।
इस रकम में सौ-सौ रुपये के केवल चार नोट जबकि बाकी रकम 1, 2, 5 और 10 रुपये के सिक्कों के रूप में थी। पति द्वारा बड़ी संख्या में सिक्के दिए जाने पर महिला कोर्ट रूम में बिफर पड़ी और सिक्कों के तौर पर दी गई राशि का विरोध किया। महिला ने पति द्वारा उसे परेशान करने के लिए नया रास्ता तलाशने की दलील दी। साथ ही कहा कि, यह सरासर कानून का मजाक उड़ाना है।
महिला ने कहा कि पति हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं और पेशे से वकील हैं। उनके कई बड़े-बड़े क्लाइंट हैं। उन्हें कई प्रापर्टी से लाखों रुपये महीने का किराया आता है। ऐसे में उनका कोर्ट में दलील देना कि उनके पास पैसे नहीं हैं, यह सरासर कोर्ट को गुमराह करना है। वहीं पति ने अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि, कानून में कहीं भी नहीं लिखा है कि जो पैसे दिए जाने हैं, वह किन तरह से (नोट-सिक्के) दिए जाने हैं।
इस रकम में सौ-सौ रुपये के केवल चार नोट जबकि बाकी रकम 1, 2, 5 और 10 रुपये के सिक्कों के रूप में थी। पति द्वारा बड़ी संख्या में सिक्के दिए जाने पर महिला कोर्ट रूम में बिफर पड़ी और सिक्कों के तौर पर दी गई राशि का विरोध किया। महिला ने पति द्वारा उसे परेशान करने के लिए नया रास्ता तलाशने की दलील दी। साथ ही कहा कि, यह सरासर कानून का मजाक उड़ाना है।
महिला ने कहा कि पति हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं और पेशे से वकील हैं। उनके कई बड़े-बड़े क्लाइंट हैं। उन्हें कई प्रापर्टी से लाखों रुपये महीने का किराया आता है। ऐसे में उनका कोर्ट में दलील देना कि उनके पास पैसे नहीं हैं, यह सरासर कोर्ट को गुमराह करना है। वहीं पति ने अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि, कानून में कहीं भी नहीं लिखा है कि जो पैसे दिए जाने हैं, वह किन तरह से (नोट-सिक्के) दिए जाने हैं।
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गुजारा भत्ता नहीं, हर महीने दाल चावल और घी दे दूंगा
फाइल फोटो
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में पति-पत्नी के विवाद का पहला ऐसा मामला सामने आया, जिसमें पति ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने के बदले अजीबोगरीब शर्त रखी। वहीं जज ने भी अनोखा फैसला सुनाकर केस को रोचक बना दिया। मामला भिवानी जिले का है, जहां वैवाहिक विवाद के चलते निचली अदालत ने पति को हर माह पत्नी को तय राशि का भुगतान करने के आदेश दिए थे। इस आदेश के खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी।
याचिका पर सुनवाई के दौरान पति ने कहा कि वो कोर्ट द्वारा तय रकम देने में सक्षम नही है। वह जिस कंपनी में काम करता था, वह कंपनी अब बंद हो चुकी है, ऐसे में वह पैसे में भुगतान नहीं कर सकता। पैसा देने की जगह वह पत्नी को उसके गुजारे के लिए घर का राशन दे सकता है। वो पत्नी को प्रति माह 20 किलो चावल, 5 किलो चीनी, 5 किलो दाल, 15 किलो अनाज, 5 किलो देसी घी के अलावा रोजाना दो किलो दूध दे सकता है।
हाईकोर्ट ने पति की इस शर्त को स्वीकार भी कर लिया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पति तीन दिन के भीतर पूरा राशन अपनी पत्नी को दे व गुजारा भत्ते का पिछला भुगतान करे। अगली सुनवाई पर इस बाबत कोर्ट में हलफनामा देकर जानकारी भी दे कि उसने यह सब भुगतान कर दिया है।
याचिका पर सुनवाई के दौरान पति ने कहा कि वो कोर्ट द्वारा तय रकम देने में सक्षम नही है। वह जिस कंपनी में काम करता था, वह कंपनी अब बंद हो चुकी है, ऐसे में वह पैसे में भुगतान नहीं कर सकता। पैसा देने की जगह वह पत्नी को उसके गुजारे के लिए घर का राशन दे सकता है। वो पत्नी को प्रति माह 20 किलो चावल, 5 किलो चीनी, 5 किलो दाल, 15 किलो अनाज, 5 किलो देसी घी के अलावा रोजाना दो किलो दूध दे सकता है।
हाईकोर्ट ने पति की इस शर्त को स्वीकार भी कर लिया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पति तीन दिन के भीतर पूरा राशन अपनी पत्नी को दे व गुजारा भत्ते का पिछला भुगतान करे। अगली सुनवाई पर इस बाबत कोर्ट में हलफनामा देकर जानकारी भी दे कि उसने यह सब भुगतान कर दिया है।
पति के काम नहीं आया राशन, बिजली, पानी का खर्च गिनाना
फाइल फोटो
पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए अदालत में बिजली, पानी, पेट्रोल, बीमा, टीवी इंटरनेट तक का खर्च गिनाना भी पति के काम नहीं आया। हाईकोर्ट ने कहा कि यही जरूरतें पत्नी की भी हो सकती हैं, ऐसे में पति भुगतान की जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। पति धीरज कुमार की ओर से याचिका दाखिल करते हुए कहा गया था कि पटियाला की फैमिली कोर्ट ने पत्नी और बेटे को 3-3 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के आदेश जारी किए हैं, जो बहुत अधिक है।
याची का वेतन केवल 20,090 रुपये है जिसमें उसे राशन का 9000, बिजली का 2000, पेट्रोल का 2000, बीमा का 1200, टीवी का 300, मेाबाइल का 200, गैस का 700, पानी का 400, ईएमआई का 5300 तथा अपने अभिभावकों पर 1000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में वह 6 हजार रुपये का भुगतान कैसे कर सकता है। हाईकोर्ट ने इस पर कहा कि पत्नी और बच्चों की भी खाने, रहने और सुविधाओं की आवश्यकताएं हैं। यदि याची की दोनों ईएमआई की कटौती कर दी जाती है तो भी उसके पास वेतन के रूप में प्रतिमाह 12,901 रुपये बचते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की दलीलें देकर पत्नी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पति नहीं भाग सकता। ऐसे में हर हाल में उसे पत्नी को इस राशि का भुगतान करना ही होगा। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में की गई टिप्पणी किसी भी प्रकार से निचली अदालत में लंबित मामलों पर कोई प्रभाव नहीं डालेंगी।
याची का वेतन केवल 20,090 रुपये है जिसमें उसे राशन का 9000, बिजली का 2000, पेट्रोल का 2000, बीमा का 1200, टीवी का 300, मेाबाइल का 200, गैस का 700, पानी का 400, ईएमआई का 5300 तथा अपने अभिभावकों पर 1000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में वह 6 हजार रुपये का भुगतान कैसे कर सकता है। हाईकोर्ट ने इस पर कहा कि पत्नी और बच्चों की भी खाने, रहने और सुविधाओं की आवश्यकताएं हैं। यदि याची की दोनों ईएमआई की कटौती कर दी जाती है तो भी उसके पास वेतन के रूप में प्रतिमाह 12,901 रुपये बचते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की दलीलें देकर पत्नी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पति नहीं भाग सकता। ऐसे में हर हाल में उसे पत्नी को इस राशि का भुगतान करना ही होगा। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में की गई टिप्पणी किसी भी प्रकार से निचली अदालत में लंबित मामलों पर कोई प्रभाव नहीं डालेंगी।
पति के पास नौकरी न होना पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार का आधार नहीं
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पति द्वारा नौकरी छूट जाने के कारण पत्नी को गुजारा भत्ता देने में असमर्थता जता उससे छूट देने की अपील पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने सीधे तौर पर खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पढ़ा लिखा है और उसे नौकरी मिल जाएगी, लेकिन पत्नी के पास आय का कोई साधन मौजूद नहीं है। इसलिए पति के पास नौकरी न होना पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।
हरियाणा में रोहतक निवासी व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके बताया था कि उसके और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। रोहतक की फैमिली कोर्ट ने उसे पत्नी को छह हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे, उस आदेश को खारिज किया जाना चाहिए। केस की सुनवाई के दौरान पत्नी के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि पति गुजारा भत्ता के तौर पर जो राशि देता है, वह केवल घर के किराए में निकल जाती है।
पत्नी पर एक बेटी की परवरिश की जिम्मेदारी भी है। ऐसे में फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि को बढ़ाया जाए। इस पर याची के वकील ने कहा कि याची की नौकरी अब छूट चुकी है और उसके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है, इसलिए वह इस गुजारा भत्ता की राशि का भुगतान करने में भी असमर्थ है। हाईकोर्ट ने पति की दलील को खारिज करते हुए कहा कि तय की गई राशि का भुगतान पत्नी को प्रतिमाह करना ही होगा।
हरियाणा में रोहतक निवासी व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके बताया था कि उसके और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। रोहतक की फैमिली कोर्ट ने उसे पत्नी को छह हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे, उस आदेश को खारिज किया जाना चाहिए। केस की सुनवाई के दौरान पत्नी के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि पति गुजारा भत्ता के तौर पर जो राशि देता है, वह केवल घर के किराए में निकल जाती है।
पत्नी पर एक बेटी की परवरिश की जिम्मेदारी भी है। ऐसे में फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि को बढ़ाया जाए। इस पर याची के वकील ने कहा कि याची की नौकरी अब छूट चुकी है और उसके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है, इसलिए वह इस गुजारा भत्ता की राशि का भुगतान करने में भी असमर्थ है। हाईकोर्ट ने पति की दलील को खारिज करते हुए कहा कि तय की गई राशि का भुगतान पत्नी को प्रतिमाह करना ही होगा।
पति की मौत के बाद भी तलाक को चुनौती दे सकती है पत्नी
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तलाक के एक दशक व पति की मौत के एक वर्ष बाद परिजनों के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दाखिल करने वाली जम्मू निवासी महिला को हाईकोर्ट ने कानून का दुरुपयोग करने वाला करार दिया है। साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पति की मौत के बाद भी एक्स पार्टी तलाक के आदेश को कानूनी वारिस के माध्यम से चुनौती दे सकती है। पीड़ित महिला ने बताया कि वह जम्मू की रहने वाली है और अंबाला के एक व्यक्ति से उसने विवाह किया था।
1995 में विवाह के बाद दोनों के बीच कुछ सही नहीं रहा और वह दो साल से पहले ही मायके वापस आ गई। इसके बाद उसके पति ने उसके खिलाफ तलाक का केस दाखिल कर दिया, जिसमें एक्स पार्टी ऑर्डर के तहत तलाक को 2001 में मंजूरी मिल गई। हालांकि बाद में 2003 में उसके पति ने साथ में रहने की सहमति जताई और दोनों साथ रहने लगे। इसके बाद 2005 में एक और याचिका दाखिल कर तलाक की मांग की, जो खारिज हो गई।
महिला ने बताया कि इसके बाद 2010 में पति की मौत हो गई और पति के भाइयों ने याची के पति के फर्जी हस्ताक्षर कर सारी प्रॉपर्टी और बिजनेस अपने नाम कर लिया। इसके खिलाफ याची गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अंबाला जेएमआईसी के पास अर्जी दी, जिसे मंजूर कर उसे गुजारा भत्ता देने के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन उसे सेशन कोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब 2001 में दी गई तलाक की डिक्री को अवैध ही करार नहीं दिया गया तो वह अभी भी वैध है।
साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया गया जिससे यह साबित होता हो कि याची पति के साथ उनके भाईयों के साझा घर में लंबे समय केलिए रही है। ऐसे में याची के पति के भाई उसको गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति की मौत हो चुकी है तो भी तलाक के आदेश को चुनौती दी जा सकती है।
1995 में विवाह के बाद दोनों के बीच कुछ सही नहीं रहा और वह दो साल से पहले ही मायके वापस आ गई। इसके बाद उसके पति ने उसके खिलाफ तलाक का केस दाखिल कर दिया, जिसमें एक्स पार्टी ऑर्डर के तहत तलाक को 2001 में मंजूरी मिल गई। हालांकि बाद में 2003 में उसके पति ने साथ में रहने की सहमति जताई और दोनों साथ रहने लगे। इसके बाद 2005 में एक और याचिका दाखिल कर तलाक की मांग की, जो खारिज हो गई।
महिला ने बताया कि इसके बाद 2010 में पति की मौत हो गई और पति के भाइयों ने याची के पति के फर्जी हस्ताक्षर कर सारी प्रॉपर्टी और बिजनेस अपने नाम कर लिया। इसके खिलाफ याची गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अंबाला जेएमआईसी के पास अर्जी दी, जिसे मंजूर कर उसे गुजारा भत्ता देने के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन उसे सेशन कोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब 2001 में दी गई तलाक की डिक्री को अवैध ही करार नहीं दिया गया तो वह अभी भी वैध है।
साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया गया जिससे यह साबित होता हो कि याची पति के साथ उनके भाईयों के साझा घर में लंबे समय केलिए रही है। ऐसे में याची के पति के भाई उसको गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति की मौत हो चुकी है तो भी तलाक के आदेश को चुनौती दी जा सकती है।
शहीद की पत्नी या पति जिंदा तो अभिभावक नहीं हैं फैमिली पेंशन के हकदार
फाइल फोटो
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने शहीद की मां द्वारा फैमिली पेंशन की मांग से जुड़ी याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि कर्मी के पति या पत्नी जिंदा हैं तो अभिभावक इसके लिए हकदार नहीं हैं। कैथल निवासी महिला ने याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उसके बेटे की मौत के बाद उसने फैमिली पेंशन के लिए आवेदन किया था। उसके आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया जबकि उसके पास आय का कोई जरिया नहीं था।
याची ने कहा था कि वह पूरी तरह से अपने बेटे की आय पर आश्रित थी और अब ऐसे में उसे फैमिली पेंशन में हिस्सा दिया जाए। इस पर केंद्र व अन्य प्रतिवादियों की ओर से बताया गया कि याची के दो बेटे और हैं और साथ ही याची के पास 22 कनाल जमीन भी है। हाईकोर्ट ने इसके बाद विभिन्न प्रावधानों को देखने के बाद अपना फैसला याची के खिलाफ सुनाया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी कर्मी की मौत हो जाती है और उसका पति या पत्नी जिंदा हो तो उस स्थिति में केवल वे ही फैमिली पेंशन के हकदार होंगे। अभिभावक भले ही अपने बेटे पर आश्रित हों लेकिन वह फैमिली पेंशन के लिए दावा नहीं कर सकते हैं। इस फैसले को याची ने खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और कहा कि अभिभावक होने के नाते वह पेंशन में हिस्से के हकदार हैं।
चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी पर आधारित खंडपीठ ने भी याची के विरोध में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि पति/पत्नी के रहते अभिभावक फैमिली पेंशन के लिए पात्र नहीं हैं।
याची ने कहा था कि वह पूरी तरह से अपने बेटे की आय पर आश्रित थी और अब ऐसे में उसे फैमिली पेंशन में हिस्सा दिया जाए। इस पर केंद्र व अन्य प्रतिवादियों की ओर से बताया गया कि याची के दो बेटे और हैं और साथ ही याची के पास 22 कनाल जमीन भी है। हाईकोर्ट ने इसके बाद विभिन्न प्रावधानों को देखने के बाद अपना फैसला याची के खिलाफ सुनाया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी कर्मी की मौत हो जाती है और उसका पति या पत्नी जिंदा हो तो उस स्थिति में केवल वे ही फैमिली पेंशन के हकदार होंगे। अभिभावक भले ही अपने बेटे पर आश्रित हों लेकिन वह फैमिली पेंशन के लिए दावा नहीं कर सकते हैं। इस फैसले को याची ने खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और कहा कि अभिभावक होने के नाते वह पेंशन में हिस्से के हकदार हैं।
चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी पर आधारित खंडपीठ ने भी याची के विरोध में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि पति/पत्नी के रहते अभिभावक फैमिली पेंशन के लिए पात्र नहीं हैं।
शादी किसी और से करना चाहती थी, हाईकोर्ट ने कहा- यह क्रूरता से कम नहीं
फाइल फोटो
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने तलाक के फैसले के खिलाफ दाखिल पत्नी की अपील को खारिज करते हुए कहा कि पति को सुहाग रात पर यह कहना कि किसी और से शादी करना चाहती थी यह किसी क्रूरता से कम नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील को खारिज कर दिया।
याचिका दाखिल करते हुए पत्नी ने रेवाड़ी की अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसके पति को उससे तलाक दिया गया था। याची ने कहा कि पति द्वारा लगाए गए आरोप गलत है। इसपर पति की ओर से कहा गया कि 2008 में उसकी शादी हुई थी और शादी के एक महीने बाद ही पत्नी घर छोड़ कर चली गई।
शादी के अगले ही दिन उसकी पत्नी ने उससे व उसकी मां से बदसलूकी की। साथ ही यह भी बताया कि सुहागरात के समय पत्नी ने कहा कि वह उससे शादी करना ही नहीं चाहती थी वह किसी और से शादी करना चाहती थी। पत्नी ने हाईकोर्ट में इन आरोपों को नकारा। इस बीच पति ने कहा कि पत्नी ने घर छोड़ने के बाद उसे और उसके परिवार को परेशान करने के लिए पुलिस में शिकायत भी दे दी।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसलासुनाते हुए कहा कि क्रूरता का कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे इसको आंका जा सके। हर मामले में परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिया जाता है। इस मामले में पत्नी द्वारा दर्ज की गई शिकायत से पति और उसके परिवार को बहुत कुछ झेलना पड़ा जो गलत है। वैसे भी पत्नी द्वारा पति को सुहागरात पर यह कहना कि तुमसे शादी नहीं करना चाहती थी किसी और से करना चाहती थी इससे बड़ी क्रूरता और क्या हो सकती है।
याचिका दाखिल करते हुए पत्नी ने रेवाड़ी की अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसके पति को उससे तलाक दिया गया था। याची ने कहा कि पति द्वारा लगाए गए आरोप गलत है। इसपर पति की ओर से कहा गया कि 2008 में उसकी शादी हुई थी और शादी के एक महीने बाद ही पत्नी घर छोड़ कर चली गई।
शादी के अगले ही दिन उसकी पत्नी ने उससे व उसकी मां से बदसलूकी की। साथ ही यह भी बताया कि सुहागरात के समय पत्नी ने कहा कि वह उससे शादी करना ही नहीं चाहती थी वह किसी और से शादी करना चाहती थी। पत्नी ने हाईकोर्ट में इन आरोपों को नकारा। इस बीच पति ने कहा कि पत्नी ने घर छोड़ने के बाद उसे और उसके परिवार को परेशान करने के लिए पुलिस में शिकायत भी दे दी।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसलासुनाते हुए कहा कि क्रूरता का कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे इसको आंका जा सके। हर मामले में परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिया जाता है। इस मामले में पत्नी द्वारा दर्ज की गई शिकायत से पति और उसके परिवार को बहुत कुछ झेलना पड़ा जो गलत है। वैसे भी पत्नी द्वारा पति को सुहागरात पर यह कहना कि तुमसे शादी नहीं करना चाहती थी किसी और से करना चाहती थी इससे बड़ी क्रूरता और क्या हो सकती है।
पति-पत्नी के संबंध, तलाक और बच्चे की परवरिश पर फैसला
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पति-पत्नी के संबंध, तलाक और बच्चे की परवरिश पर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया और कड़ी टिप्पणी भी की। यह दोनों पक्षों के लिए राहत भी और एक तरह का झटका भी है।
एक साल की छोटी बच्ची के भविष्य को देखते हुए दंपति को तलाक की अनुमति देने से इनकार करने वाले जिला अदालत के आदेश को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पलट दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अदालत हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान के अनुसार ही फैसला दे सकती है और हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा प्रावधान नहीं है कि बच्चे के भविष्य को आधार बनाकर कोर्ट तलाक से इनकार कर सके।
जिला अदालत फिरोजपुर में एक दंपति ने तलाक के लिए याचिका दाखिल की थी। दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से तलाक के लिए केस दाखिल किया था। उनका विवाह दिसंबर 2015 में हुआ था और इस विवाह से उनकी एक बेटी भी थी। जिला अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा था कि दोनों की एक छोटी बच्ची है और तलाक से उसका भविष्य खराब हो सकता है। यह दलील देते हुए जिला अदालत ने केस को खारिज कर दिया था।
केस खारिज होने के बाद दोनों ने फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए जिला अदालत के फैसले को गलत करार दिया। कोर्ट ने कहा कि अदालत का काम कानून के अनुरूप फैसला करना है। इस मामले में अदालत ने फैसला सुनाते हुए हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान को नहीं देखा। छोटी बच्ची के भविष्य को देखते हुए फैसला सुनाया गया जो गलत है।
हाईकोर्ट ने कहा बच्ची के माता पिता को उसका भविष्य देखना है और यह उनका काम है। तलाक से जुड़े मामलों में इस प्रकार बच्चे के भविष्य को देखते हुए तलाक मंजूर न करने का फैसला अदालत नहीं सुना सकती है। यह उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर है। हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ ही केस को वापस जिला अदालत भेजते हुए हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप सुनवाई कर फैसला लेने का आदेश दिए।
एक साल की छोटी बच्ची के भविष्य को देखते हुए दंपति को तलाक की अनुमति देने से इनकार करने वाले जिला अदालत के आदेश को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पलट दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अदालत हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान के अनुसार ही फैसला दे सकती है और हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा प्रावधान नहीं है कि बच्चे के भविष्य को आधार बनाकर कोर्ट तलाक से इनकार कर सके।
जिला अदालत फिरोजपुर में एक दंपति ने तलाक के लिए याचिका दाखिल की थी। दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से तलाक के लिए केस दाखिल किया था। उनका विवाह दिसंबर 2015 में हुआ था और इस विवाह से उनकी एक बेटी भी थी। जिला अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा था कि दोनों की एक छोटी बच्ची है और तलाक से उसका भविष्य खराब हो सकता है। यह दलील देते हुए जिला अदालत ने केस को खारिज कर दिया था।
केस खारिज होने के बाद दोनों ने फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए जिला अदालत के फैसले को गलत करार दिया। कोर्ट ने कहा कि अदालत का काम कानून के अनुरूप फैसला करना है। इस मामले में अदालत ने फैसला सुनाते हुए हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधान को नहीं देखा। छोटी बच्ची के भविष्य को देखते हुए फैसला सुनाया गया जो गलत है।
हाईकोर्ट ने कहा बच्ची के माता पिता को उसका भविष्य देखना है और यह उनका काम है। तलाक से जुड़े मामलों में इस प्रकार बच्चे के भविष्य को देखते हुए तलाक मंजूर न करने का फैसला अदालत नहीं सुना सकती है। यह उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर है। हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ ही केस को वापस जिला अदालत भेजते हुए हिंदू मैरिज एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप सुनवाई कर फैसला लेने का आदेश दिए।