देश में पहली बार ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ की नियुक्ति होने जा रही है और इससे रक्षा विशेषज्ञों को कई उम्मीदें हैं। जानिए आखिर इनकी जरूरत क्यों पड़ी और क्या फायदे होंगे।
दरअसल, सरकार और सभी आर्म्ड फोर्सेज में और बेहतर तालमेल बने, यह देश की सुरक्षा के लिए बहुत आवश्यक है। इसी कड़ी में ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ की नियुक्ति और भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। उक्त विचार व्यक्त करते हुए विभिन्न रक्षा विशेषज्ञों को देश में पहली बार होने वाली इस नियुक्ति से बड़ी उम्मीद है। इतना ही नहीं विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि रक्षा मंत्रालय में सिर्फ सैन्य पृष्ठभूमि के अफसरों की ही नियुक्ति होनी चाहिए।
मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल के आखिरी दिन ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ के पद के सृजन विषय पर चर्चा हुई। संचालन लेफ्टिनेंट जनरल रिटायर्ड अदित्य सिंह ने किया, जबकि पैनल चर्चा में एयर मार्शल रिटायर्ड मनमोहन बहादुर, पूर्व रक्षा सचिव शेखर दत्त, दिल्ली में ब्रिटिश हाई कमिश्नर के सलाहकार ब्रिगेडियर जैविन थॉमसन और लेफ्टिनेंट जनरल रिटायर्ड संजीव लंगेर ने शिरकत की।
पैनल के सदस्यों ने इस पद की स्थापना के कदम की सराहना करते हुए कहा कि 1999 के कारगिल युद्ध के बाद 2001 में मंत्रियों के समूह ने इस पद की स्थापना की सिफारिश की थी। संचालक लेफ्टिनेंट जनरल अदित्य सिंह ने कहा कि इस पद का सृजन करने का मुख्य मकसद थल सेना, जल सेना और वायु सेना के बीच बेहतर तालमेल यकीनी बनाना था। उन्होंने कहा कि ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ रक्षा संबंधी सलाह देने के साथ-साथ सेनाओं के अलग- अलग अंगों में तालमेल की भूमिका निभाएगा।
पूर्व रक्षा सचिव शेखर दत्त ने कहा कि ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ के पद का सृजन इसलिए किया गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में तीनों सेनाओं की एकीकृत सलाह सरकार को मिल सके। आने वाले दिनों में इस पद पर पहली नियुक्ति होने की उम्मीद है। ब्रिटिश हाई कमिश्नर के सलाहकार ब्रिगेडियर जैविन थॉमसन ने कहा कि सेनाओं के लिए एक एकीकृत संस्था की मुख्य जरूरत होती है कि फैसले लेने के लिए एक संस्था हो। ब्रिटेन में यह प्रणाली कई वर्षों से चल रही है। उन्होंने ब्रिटिश सेना के 83 साल के इतिहास का भी ज़िक्र किया और अपनी सेना में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के कामकाज संबंधी जानकारी दी।