युद्ध में घायल सैनिकों के लिए खूनदान करते गबरुद्दीन की जिंदगी बीती। पूंजी जोड़ घर में मस्जिद बना दी और जमीन मंदिर के लिए दान दे दी। ऐसे हैं गबरूद्दीन।
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पानीपत के गबरुद्दीन
- फोटो : फाइल फोटो
1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आह्वान पर गबरूद्दीन में रक्तदान करने का ऐसा जुनून जागा कि 72 साल की उम्र पार करते-करते 201 बार रक्तदान कर दिया। प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री से कई बार सम्मानित हो चुके गबरुद्दीन खुद गले के कैंसर से जूझ रहे हैं। उनके लिए कई लोगों ने मदद को हाथ बढ़ाया लेकिन स्वाभिमानी शख्स ने सिर्फ देना ही सीखा है।
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पानीपत के गबरुद्दीन
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किडनी दान करने के बाद देहदान का संकल्प लिया। उम्र के आखिरी पड़ाव में गले के कैंसर से जूझ रहे हैं फिर भी बस दूसरों से दुआ की आस ही रखते हैं। हर किसी की मदद को दरकिनार कर खुद कर्ज लेकर कैंसर का इलाज करवा रहे हैं। इलाज पर आठ लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, इसमें 6.80 लाख रुपये का कर्ज है। गबरुद्दीन का कहना है कि, अब तो जो मांगना है, अल्लाह से ही मांगूंगा। मेरे पास जो भी है वह इस दुनिया के लिए छोड़कर जाना है।
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पानीपत के गबरुद्दीन
- फोटो : फाइल फोटो
गबरुद्दीन (75 वर्तमान आयु) मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के गांव बघरा मांडी के रहने वाले हैं। 25 साल की उम्र में कपड़ा बेचने का काम करते थे। सोनीपत अपनी उधारी लेने आए और यहीं के होकर रह गए। कपड़े बेचने का काम छोड़ उन्होंने भैंसा-बुग्गी ले ली और काम शुरू किया। कबीरपुर में मकान बना लिया और जयमून से शादी कर ली। परिवार में तीन लड़के और एक लड़की हैं।
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पानीपत के गबरुद्दीन
- फोटो : फाइल फोटो
गबरुद्दीन ने बताया कि जब कबीरपुर आया था तो लोगों ने पंचायत की जमीन को घेर रखा था। जिस जमीन पर उसका परिवार उपले रखता था, उसके पास माता का छोटा सा मंदिर था। उसने अपने हिस्से की पंचायती जमीन गुड़गांव वाली माता का भव्य मंदिर बनाने को दे दी। वहीं, कबीरपुर के आसपास कोई मस्जिद नहीं थी। इस कारण अपने घर को ही मस्जिद बना दिया। चार मंजिला घर की नीचे वाली दो मंजिलों पर हर रोज मुस्लिम समाज के लोग नमाज पढ़ते हैं।