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'कलेजे का टुकड़ा था, आखिरी बार चेहरा भी नहीं देख सकी'...ताबूत देखकर बेहोश हुई मां

Sat, 14 Apr 2018 10:50 AM IST
आर रघुवंशी/अमर उजाला, बटाला(पंजाब)
आर रघुवंशी/अमर उजाला, बटाला(पंजाब) Updated Sat, 14 Apr 2018 10:50 AM IST
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39 Indians Killed in Iraq, Dharminder Singh Funeral in Batala Village
धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
वो मेरे कलेजे का टुकड़ा था, कितनी बदनसीब हूं आखिरी बार चेहरा भी नहीं देख सकती...और ताबूत देखकर मां बेहोश हो गई।
39 Indians Killed in Iraq, Dharminder Singh Funeral in Batala Village
धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
इराक में मारे गए 39 भारतीयों में से बटाला के दो लोगों के अवशेष सोमवार को उनके घर लाए गए। अमृतसर से एंबुलेंस के जरिये बटाला के गांव तलवंडी झूरा के रहने वाले धरमिंदर कुमार के घर में उनका अवशेष पहुंचा तो कोहराम मच गया। एसडीएम रोहित गुप्ता की अगुवाई में पारिवारिक सदस्यों को अवशेष सौंपे गए। मां कंवलजीत और बहन डिंपलजीत के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, मां तो बेहोश ही हो गई थी।
39 Indians Killed in Iraq, Dharminder Singh Funeral in Batala Village
धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
सोमवार देर शाम करीब 6:30 बजे गांव के शमशान घाट में दाह संस्कार किया गया। बहन डिंपलजीत का कहना था कि उन्हें आस थी कि एक दिन उनका भाई जरूर आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। वह अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिए तरस रही थीं। उसे नहीं पता था कि भाई इस तरह घर आएगा। अगर सरकार को यह सब पता था तो अभिभावकों को अंधेरे में क्यों रखा गया।
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39 Indians Killed in Iraq, Dharminder Singh Funeral in Batala Village
धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
धरमिंदर की मां ने कहा कि सरकार आतंकियों को मारकर बेटे की मौत का बदला ले। उन्होंने कई सपने देखे थे, लेकिन साकार नहीं हो सकते। धरमिंदर की मां ने सरकार से मांग की कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उनकी कोई माली सहायता की जाए ताकि धरमिंदर के बाद उनका जीवन ठीक से व्यतीत हो सके। गौरतलब है कि बटाला के गांव तलवंडी झूरां के रहने वाला 27 वर्षीय धरमिंदर कुमार रोजी रोटी के लिए इराक 2013 में गए थे।
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39 Indians Killed in Iraq, Dharminder Singh Funeral in Batala Village
धर्मिंदर सिंह का अंतिम संस्कार
पिता राजकुमार कहते हैं कि इस उम्र में बेटे की चिता को आग देनी पड़ रही है। इससे ज्यादा बदनसीबी और क्या होगी। वह सहारा बनने की बजाय बेसहारा छोड़कर चल गया। अगर सरकार की तरफ से समय रहते कोई ठोस कदम उठाया जाता तो उसके बेटे के साथ बाकी लोगों को भी बचाया सकता था। बेटे को आखिरी बार देखने की हसरत भी रह गई। सारी जिंदगी दिल को यह बात कचोटती रहेगी।
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